📜 सुन्दरकाण्ड पाठ श्री रामचरितमानस — गोस्वामी तुलसीदास जी कृत — हनुमान जी की दिव्य लंका यात्रा

1. मंगलाचरण एवं प्रस्थान

श्री रामचन्द्र जी, हनुमान जी एवं सीता माता की स्तुति तथा पवनपुत्र हनुमान जी का सागर लाँघकर लंका की ओर प्रस्थान

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्॥
१ ॥
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मैं उन भगवान् श्री राम की वंदना करता हूँ, जो शान्त स्वरूप, सनातन, अप्रमेय, निष्पाप, मोक्ष रूपी परम शान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषनाग से निरन्तर सेवित, वेदान्त द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं के गुरु, माया से मनुष्य रूप धारण करने वाले, पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ और राजाओं के मुकुटमणि हैं।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥
२ ॥
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हे रघुपति! मेरे हृदय में कोई दूसरी इच्छा नहीं है, मैं सत्य कहता हूँ और आप सब के अन्तरात्मा हैं। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरी (पूर्ण) भक्ति दीजिये और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिये।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
३ ॥
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अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य रूपी वन को ध्वंस करने के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान् जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
१॥
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जाम्बवान् के सुंदर वचन सुनकर हनुमान् जी के हृदय में बहुत ही अच्छे लगे। (वे बोले-) हे भाई! तुम लोग तब तक मेरे लिए यहीं (समुद्र तट पर) दु:ख सहकर, कंद, मूल और फल खाकर प्रतीक्षा करना।
जब लगि आवौं सीतहि देखी।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहँ माथा।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जब तक मैं सीता जी को देखकर न लौट आऊँ। मुझे बड़ा हर्ष हो रहा है, इससे मेरा काम अवश्य होगा। ऐसा कहकर और सबको मस्तक नवाकर, हृदय में श्री रघुनाथ जी को धारण करके हनुमान् जी हर्षित होकर चले।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार बार रघुबीर सँभारी।
तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
समुद्र के तीर पर एक सुंदर पर्वत (महेन्द्र पर्वत) था, खेल से ही (सहज ही) हनुमान् जी उस पर कूदकर चढ़ गए। बार-बार श्री रघुवीर का स्मरण करके महान् बलवान् पवनपुत्र हनुमान् जी बड़े जोर से उछले।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
एही भाँति चलेउ हनुमाना॥
४॥
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जिस पर्वत पर हनुमान् जी ने पैर रखा, वह तुरन्त ही पाताल में धँस गया। जिस प्रकार श्री रघुनाथ जी का अमोघ बाण चलता है, उसी प्रकार हनुमान् जी चले।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥
५॥
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समुद्र ने विचार किया कि हनुमान् जी श्री रघुनाथ जी के दूत हैं, इसलिए उसने (समुद्र ने) मैनाक पर्वत से कहा- हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करने वाला हो जा (उनके विश्राम के लिए जल से ऊपर आ जा)।
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
१॥
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हनुमान् जी ने उसे (मैनाक को) हाथ से छू दिया और फिर प्रणाम करके कहा- श्री रामचन्द्र जी का काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ?
जात पवनसुत देवन्ह देखा।
जानैं कहँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥
१॥
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देवताओं ने पवनपुत्र हनुमान् जी को जाते हुए देखा। उनका विशेष बल और बुद्धि जानने के लिए उन्होंने सुरसा नामक सर्पों की माता को भेजा; वह आकर उनसे यह बात बोली-
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
आज देवताओं ने मुझे आहार दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमान् जी ने कहा- मैं श्री राम जी का काम करके फिर लौट आऊँगा और सीता जी की खोज (का समाचार) प्रभु को सुना दूँगा,
तब तव बदन पैठिहउँ आई।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।
ग्रसिस न मोहि कहेउ हनुमाना॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
तब मैं आकर तुम्हारे मुँह में घुस जाऊँगा। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। सुरसा ने कहा- चाहे कोई कैसा ही यत्न करे, मैं उसे जाने नहीं देती। हनुमान् जी ने कहा- तो फिर मुझे खा क्यों नहीं लेती?
जोजन भरि तिहिं बदनु पसारा।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥
४॥
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उसने योजन (चार कोस) भर अपना मुँह फैला लिया। तब हनुमान् जी ने अपने शरीर को उससे दुगुना विस्तार वाला कर लिया। उसने सोलह योजन का मुँह ठान लिया (फैलाया)। पवनपुत्र तुरंत बत्तीस योजन (के) हो गए।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जैसे-जैसे सुरसा अपना मुँह बढ़ाती थी, हनुमान् जी उसका दुगुना रूप दिखाते थे। उसने सौ योजन का मुख किया, तब पवनपुत्र ने अत्यंत छोटा रूप धारण कर लिया।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥
६॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
वे उसके मुँह में घुसकर तुरंत बाहर आ गए और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। (उसने कहा-) मैंने तुम्हारे बुद्धि और बल का रहस्य पा लिया, जिसके लिए देवताओं ने मुझे भेजा था।
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
तुम श्री रामचन्द्र जी का सब काम करोगे, क्योंकि तुम बल और बुद्धि के भंडार हो। यह आशीर्वाद देकर वह हर्षित होकर चली गई, तब हनुमान् जी भी चले।
निसिचरि एक सिंधु महँ रहई।
करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को पकड़ लेती थी। आकाश में जो जीव-जंतु उड़ते हैं, जल में उनकी परछाईं देखकर—
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
वह उस परछाईं को पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे। इस प्रकार वह सदा आकाश में उड़ने वाले जीवों को खाया करती थी। उसने हनुमान् जी के साथ भी वही छल किया। हनुमान् जी ने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
वीर धीरबुद्धि मारुति ने उसे मार डाला और समुद्र के पार चले गए। वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी; मधु (रस) के लोभ से भौंरे गुंजार कर रहे हैं।
नाना तरु फल फूल सुहाए।
खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
अनेकों प्रकार के वृक्षों में सुंदर फल और फूल लगे हुए हैं; पक्षी और पशुओं के समूह देखकर मन को बहुत भाए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमान् जी भय त्याग कर दौड़कर उस पर चढ़ गए।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा।
कनक कोटि कर परम प्रकासा॥
६॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कनक कोटि बिचित्र मणि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहुबिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मसक समान रूप कपि धरी।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी।
रुधिर बमत धरनीं डनमनी॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
पुनि संभारि उठी सो लंका।
जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म कर दीन्हा।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बिकल होसि तैं कपि कें मारे।
तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहुता।
देखेउँ नयन राम कर दूता॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

2. लंका प्रवेश

हनुमान जी द्वारा सुरसा, सिंहिका आदि बाधाओं पर विजय प्राप्त कर सुवर्ण नगरी लंका में प्रवेश एवं विभीषण जी से भेंट

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।
राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं।
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सयन किएँ देखा कपि तेही।
मंदिर महँ न दीख बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा।
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
लंका निसिचर निकर निवासा।
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महँ तरक करैं कपि लागा।
तेहीं समय बिभीषनु जागा॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी।
साधु ते होइ न कारज हानी॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।
मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।
आयहु मोहि करन बड़भागी॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥
६॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।
जिमि दसनन्हि महँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तामस तनु कछु साधन नाहीं।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।
करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कहहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा।
तेहि दिन ताहि न मिले अहारा॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
अस मैं अधम सखा सुनु मोह पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥
७॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जानतहुँ अस स्वामि बिसारी।
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा।
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
पुनि सब कथा बिभीषन कही।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन असोक सीता रह जहवाँ॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

3. माता सीता से भेंट

हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका में माता सीता की खोज, श्री राम जी की मुद्रिका अर्पित कर माता को सान्त्वना प्रदान

देखि मनहि महँ कीन्ह प्रनामा।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥
८॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तरु पल्लव महँ रहा लुकाई।
करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।
संग नारि बहु किएँ बनावा॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।
साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।
मंदोदरी आदि सब रानी॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा।
एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही।
सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सठ सूनेहु हरि आनेहि मोही।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥
९॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सीता तैं मम कृत अपमाना।
कटिहउँ तब सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी।
सुमुखि होति न त जीवन हानी॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंदर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
चंद्रहास हरु मम परितापं।
रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा।
कह सीता हरु मम दुख भारा॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनत बचन पुनि मारन धावा।
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मास दिवस महँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥
१०॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
त्रिजटा नाम राच्छसी एका।
राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना।
सीतहि सेइ करह हित अपना॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सपनेँ बानर लंका जारी।
जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा।
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं।
जनकसुता के चरनन्हि परीं॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥
११॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई।
दुसह बिरह अब नहिं सहि जाई॥
१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
आनि काठ रचु चिता बनाई।
मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥
२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी।
अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
मिलहि न पावक मिटहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा।
अवनि न आवत एकउ तारा॥
४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
पावकमय ससि स्वत न आगी।
मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
५॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
नूतन किसलय अनल समाना।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥
६॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥
१२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तब देखी मुद्रिका मनोहर।
राम नाम अंकित अति सुंदर॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
चिकति चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जीति को सकइ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई।
आदिहु तें सब कथा सुनाई॥
३॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई।
कहि सो प्रगट होइ किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥
४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥
५॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
नर बानरहि संग कह कैसें।
कहि कथा भई संगति जैसें॥
६॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥
१३॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
हरिजन हानि प्रीति अति गाढ़ी।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना।
भयहु तात मो कहँ जलजाना॥
१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
अब कह कुसल जाउँ बलिहारी।
अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई।
कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥
२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सहज बानि सेवक सुख दायक।
कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता।
होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥
३॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बचनु न आव नयन भरे बारी।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥
४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता।
तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना।
तुम्ह ते प्रेमु राम केँ दूना॥
५॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥
१४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

4. श्री राम का संदेश

हनुमान जी द्वारा भगवान श्री राम का अपार प्रेम, दिव्य आश्वासन एवं शीघ्र आगमन का संदेश माता सीता को प्रदान

कहेउ राम बियोग तव सीता।
मो कहँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू।
कालनिसा सम निसि सासि भानू॥
१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥
२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कहहु तें कछु दुख घटि होई।
काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
३॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही।
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई।
सुनि मम बचन तजहु कदराई॥
५॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥
१५॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जौं रघुबीर होइ सुधि पाई।
करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
राम बान रबि उएँ जानकी।
तम बरूथ कहँ जातुधान की॥
१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई।
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना।
जातुधान अति भट बलवाना॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मोरें हृदय परम संदेहा।
सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा।
समर भयंकर अतिबल बीरा॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनु मात साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥
१६॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मन संतोष सुनत कपि बानी।
भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना।
होहु तात बल सील निधाना॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बार बार नाएसि पद सीसा।
बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता।
आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।
लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी।
परम सुभट रजनीचर भारी॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं।
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥
१७॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

5. अशोक वाटिका विध्वंस

हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका का उजाड़ना, अक्षयकुमार सहित राक्षस सेना का संहार एवं दिव्य पराक्रम का प्रदर्शन

चलेउ नाइ सिर पैठेउ बागा।
फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे।
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
नाथ एक आवा कपि भारी।
तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे।
रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनि रावन पठए भट नाना।
तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे।
गए पुकारत कछु अधमारे॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा।
चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा।
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥
१८॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना।
पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा।
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा।
कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
अति बिसाल तरु एक उपारा।
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा।
गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा।
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई।
ताहि एक छन मुरुछा आई॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
उठि बहोरि कीन्हसि बहु माया।
जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥
१९॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
ब्रह्मबान कपि कहँ तेहिं मारा।
परेउँ भूमि कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयउ।
नागपास बांधेसि लै गयउ॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी।
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा।
प्रभु कारज लगि कपिहि बँधावा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

6. रावण की सभा में

निर्भय हनुमान जी का रावण की राजसभा में प्रभु श्री राम की महिमा का वर्णन, माता सीता को लौटाने एवं शरणागति का उपदेश

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए।
कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीख कपि जाई।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका।
जिमि अहिगन महँ गरुड़ असंका॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥
२०॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कह लंकेस कवन तैं कीसा।
केहिं केँ बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।
देखउँ अति असंक सठ तोही॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मारे निसिचर केहिं अपराधा।
कह सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया।
पाइ जासु बल बिरचत माया॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जाकेँ बल बिरंचि हरि ईसा।
पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन।
अंडकोस समेत गिरि कानन॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता।
तुम्ह से सठन्ह सिखावन दाता॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली।
बधे सकल अतुलित बलसाली॥
४॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥
२१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जानेउ मैं तुम्हारि प्रभुताई।
सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा।
सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा।
कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब केँ देह परम प्रिय स्वामी।
मारहिं मोहि कुमारग गामी॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे।
तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बिनती करउँ जोरि कर रावन।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी।
छमा तजि भजहु भगत भय हारी॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जाकेँ डर अति काल डेराई।
जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै।
मोरे कहेँ जानकी दीजै॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखहहिं तव अपराध बिसारि॥
२२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम चरन पंकज उर धरहू।
लंकाँ अचल राज तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका।
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा।
देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी।
सब भूषन भूषित बर नारी॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं।
बरिष गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी।
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥
२३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जदपि कहि कपि अति हित बानी।
भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी।
मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मृत्यु निकट आई खल तोही।
लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कहु हनुमाना।
मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना।
बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए।
सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
नाइ सीस करि बिनय बहूता।
नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई।
सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर।
अंग भंग करि पठइअ बंदर॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

7. लंका दहन

राक्षसों द्वारा पूँछ में अग्नि लगाने पर वीर हनुमान जी का सम्पूर्ण स्वर्ण नगरी लंका को भस्म करना (विभीषण जी का गृह सुरक्षित)

कपि केँ ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥
२४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
पूँछ हीन बानर तहँ जाइहि।
तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कइ कीन्हसि बहुत बड़ाई।
देखउँ मैं तिन्ह कइ प्रभुताई॥
१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना।
भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना।
लागे रचे मूढ़ सोइ रचना॥
२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
रहा न नगर बसन घृत तेला।
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहुँ आए पुरबासी।
मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥
३॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी।
नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता।
भयउ परम लघुरूप तुरंता॥
४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं।
भइँ सभीत निसाचर नारीं॥
५॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥
२५॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
देह बिसाल परम हरुआई।
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला।
झपट लपट बहु कोटि कराला॥
१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा।
एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई।
बानर रूप धरेँ सुर कोई॥
२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
साधु अवग्या कर फलु ऐसा।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगर निमिष एक माहीं।
एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥
३॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥
४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

8. श्री राम के पास वापसी

विजयी हनुमान जी का सागर पार कर प्रभु श्री राम को माता सीता के कुशल-मंगल का शुभ समाचार देना

पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता केँ आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥
२६॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।
जैसेँ रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ।
हरष समेत पवनसुत लयऊ॥
१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कहहु तात अस मोर प्रनामा।
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरद सँुभारी।
हरहु नाथ मम संकट भारी॥
२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तात सठसुत कथा सुनाएहु।
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथ न आवा।
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
३॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कह कपि केहि बिधि राखउँ प्राना।
तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती।
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥
४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥
२७॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी।
गर्भ स्रविहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा।
सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥
१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना।
नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा।
कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मिले सकल अति भए सुखारी।
तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरिष रघुनायक पासा।
पूँछत कहत नवल इतिहासा॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तब मधुबन भीतर सब आए।
अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे।
मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनु सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥
२८॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जौं न होति सीता सुधि पाई।
मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार करि राजा।
आइ गए कपि सहित समाजा॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा।
मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी।
राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना।
राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहोरि तेहि मिलेऊ।
कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम कपिन्ह जब आवत देखा।
किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई।
परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥
२९॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जामवंत कह सुनु रघुराया।
जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर।
सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सोइ बिजई बिनई गुन सागर।
तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सब काजू।
जन्म हमार सुफल भा आजू॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी।
सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए।
जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

9. हनुमान जी का वृत्तान्त

हनुमान जी द्वारा भगवान श्री राम, सुग्रीव एवं सम्पूर्ण वानर सेना को लंका यात्रा का विस्तृत वृत्तान्त सुनाना

सुनत कृपानिधि मन अति भाए।
पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहउँ बान प्रभु जनकसुता कै।
बिरह बिथा तव दीन दुता कै॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
निमिष निमिष करुनानिधि जाही।
कलप कलप सम बीतहिं ताही॥
नयन पुनीत करहु अब मोरे।
सीतहि आनि दिखाइ कर तोरे॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रतिउपकार करउँ का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
६॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनु सुत उपकार कपि तोरा।
सनमुख होइ न सकइ मन मोरा॥
३०॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥
३१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
बार बार प्रभु चहइ उठावा।
प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा।
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सावधान मन करि पुनि संकर।
लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा।
करि कृपा चूड़ामनि मगावा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
चूड़ामनि हृदयँ धरि प्रभु बिसराए नैन।
बहुत पहनि सीता कर सम्मुख गए सुख ऐन॥
३२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
पुनि पुनि चूड़ामनि छबि देखहिं।
हरषि हरषि हृदयँ लगि लेहीं॥
तब हनुमंत सकल नृप बानी।
समयँ सहित रघुपतिहि सुनानी॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनत कथा अस जिउ भयउ।
कबहुँ मिलब सीतहि मैं जाइ।
सगुन होहिं मोहि सुंदर स्वप्न बानी मन भाइ॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कहु कपि राम कवन बिधि जैहउँ तव लंका।
समुद्र पार कवन करि नाथ सकल सैन्य रंका॥
३३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
प्रभु प्रताप मैं जाब न मोरा।
अगम सगम कछु नाथ न तोरा॥
नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
निज बल राम सुनहु सब भाई।
करहु सुभट सेना सब जाई॥
करि बिचार तिन्ह कीन्ह उपाइ।
सकल संग लै चले रघुराई॥
६॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सेना सहित सागर तट गए।
सागर परम पुनीत भए॥
३४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

10. विभीषण शरणागति

विभीषण जी का लंका त्यागकर प्रभु श्री राम की शरण में आगमन, भगवान द्वारा कृपापूर्वक शरणागत की रक्षा का वचन

निसिचर एक सिंधु महुँ रहई।
करि माया नभ के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
रावन सो कह एक बार।
बचन काज मम करहु बिचार॥
चले सीय हरि लोचन ताकी।
हृदयँ राखि रघुपति छबि बाकी॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा।
भयउ सकल कल्यान सुभागा॥
भजि चले भगवंत कें पासा।
सुकृत संजुत कीन्हेसि बासा॥
३५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
आइ बिभीषन नायउ सीसा।
देखे कपि प्रकट विश्वेश्वरीसा॥
सुग्रीवादि सकल कपि जने।
देखि बिभीषन मन अनुमाने॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कह सुग्रीव सुनहु रघुनायक।
बिनु कारन रिपु कीन्ह मित्रायक॥
जन कि अरि भालू कपि खाई।
दुइज पूजि पुनि बधि रखाई॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पामर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥
३६॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
पापवंत कर सहज सुभाऊ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई।
मोरें सनमुख आव कि सोई॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
निर्मल मन जन सोइ मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा।
तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
जग महुँ सखा निसाचर जेते।
लछिमन सभ मारे निमिषेते॥
जौं सभय आवा सरनाईं।
रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
उभय भाँति तेहि आनहु हमारें।
सत्य सपथ रघुनंदन नाम सँवारें॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सरनागत बच्छल प्रभु कीन्ह बिभीषन राज।
लंकेश तिलक करि राम कृपानिधि काज॥
३७॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
अब बिचारि बाँधा जल नीरा।
कहु कवन बिधि तरैं बल बीरा॥
बिभीषन कह सुनहु रघुनाथा।
कोटिक सागर सोषि एक हाथा॥
३८॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तदपि नीति अस प्रभु करि धारी।
बिनय करिअ सागर संजारी॥
प्रभु तुम्ह चातक मेघ समाना।
सागर जोगि सुजन गुन नाना॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

11. समुद्र से विनती

भगवान श्री राम द्वारा समुद्र से मार्ग देने की विनती, उपेक्षा होने पर दिव्य धनुष उठाना एवं समुद्र का भयभीत होकर शरण में आना

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥
३९॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
लछिमन बान सरासन आनू।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती।
सहज कृपन सन सुंदर नीती॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
ममता रत सन ग्यान कहानी।
अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा।
ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा।
यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मकर उरग झख गन अकुलाने।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना।
बिप्र रूप आयउ तजि माना॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥
४०॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।
छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
गगन समीर अनल जल धरनी।
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए।
सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई।
सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गँवार सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
प्रभु प्रताप मैं जाब न मोरा।
अगम सगम जाहि कछु नहिं तोरा॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई।
लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
तिन्ह केँ परस किएँ गिरि भारे।
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई।
करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ।
जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥
४१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
एहि बिधि लहेसि पयोधि अवसर।
चले सकल कपि भालू प्रबर॥
पुनि बिलंब मैं करउँ कि मोरा।
अस कहि हँसे कृपानिधि भोरा॥
६॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।

12. सेतु बन्धन एवं लंका प्रयाण

नल-नील द्वारा सागर पर दिव्य सेतु का निर्माण, वानर सेना का लंका की ओर प्रस्थान एवं सुन्दरकाण्ड का मंगल उपसंहार

हृदयँ बिचारत संभु सो हरि माया नट नाच।
प्रभु भजन बिनु मिटइ न भव भ्रम बंधन पाच॥
४२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
नीलनल कपि सब आए।
करि प्रनाम प्रभु कहँ सुख पाए॥
राम कृपाँ कपि भए सुजाना।
बाँधा सेतु नील नल नाना॥
१॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सैल बिसाल आनि कपि देहीं।
कंदुक इव नल नीलहि लेहीं॥
देखि सेतु अति सुंदर रचना।
बिहसि कृपानिधि बोले बचना॥
२॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
परम रम्य उत्तम यह धरनी।
महिमा अमित जाइ नहिं बरनी॥
करिहउँ इहाँ संभु थापना।
मोरें हृदयँ परम कल्पना॥
३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सेतुबंध भइ भट सब आए।
चढ़ि सिंधु चले अति उताए॥
४३॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सागर पार गए रघुराई।
सकल कटक उतरे अपाई॥
सुबेल गिरि प्रभु कीन्ह निवासा।
करि सेना संजोग प्रकासा॥
४॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सिखवन बिसिष राम रस भीने।
सकल कृपानिधि के अभिप्रेत कीने॥
५॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुबेल पर रघुपति छत्र उद्यत।
कपिन्ह सहित रघुराय सुखद अत॥
४४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
प्रभु कीन्ह इहाँ बिराम भालू कपिन्ह सँग साज।
अब लंका पर करहिं प्रभु चढ़ाई को अब काज॥
७॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मंदोदरी कह बचन सो सुनि दसकंठ बिहाल।
निसिचर सकल बोलाए महा जोद्धा सब काल॥
४५॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कहेसि सुत पति आन दुरावा।
प्रगट मरन सबही कहँ भावा॥
कह रावन खल अस ब्रत तोरें।
सरन गएँ न सूझ कछु मोरें॥
८॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम सरोष सिंधु महुँ बान।
अचल किये लंका हनुमान॥
इंद्र आइ प्रभु पद सिरु नावा।
जय जय जय रघुबीर सुनावा॥
४६॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
देव सकल सुर नायक आए।
अस्तुति करहिं रघुपति बल गाए॥
भरे प्रेम अंबुज दृग नीरा।
कह रघुबीर बचन धरि धीरा॥
९॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सुनहु सुरेस रावन कें जाता।
ताहि कहउँ मैं अकंटक राता॥
सुरपति बचन सुनत रघुनाथा।
हरषे सकल भालू कपि साथा॥
४७॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
लंकाँ चले सकल रघुबीरा।
राम कृपाँ कपिन्ह उर धीरा॥
चलीं कटक सिंधु टल देखी।
सुर असुर त्रपित औरउ बिसेखी॥
१०॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
भालू कपि सब करहिं अफारा।
जनु बिधि सृजे समर सँवारा॥
४८॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम कृपा बल हृदय बिचारा।
पवन तनय कपि सब पारा॥
बैठे सब कपि गिरि चहुँ ओरा।
लंका पर करि दृष्टि मयूरा॥
११॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
प्रभु सुमिरत रघुनायक नामा।
भय बिगत भे सब कपि ग्रामा॥
४९॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
दूत पठए बिभीषन जाई।
लंका नगर रावन समुदाई॥
कहेउ नाथ बलि कीजै जुद्धा।
जौं राम सनमुख होइ बुद्धा॥
१२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
अंगद कह भालू कपीसा।
कपिन्ह संग प्रभु चले रघुबंसीसा॥
घेरहु लंका चहुँ दिसि मोरा।
प्रभु आयसु सिर धरि सुख तोरा॥
५०॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सब कपिन्ह लंका चहुँ घेरी।
निसिचर सेन बोलाई बिकट फेरी॥
१३॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
प्रभु कृपाँ कपि भालू सँघारे।
रजनीचर बिकट भट मारे॥
५१॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम राम जपि जपि कपि लरहीं।
एक एकन्हि मर्दि सन्मुख करहीं॥
प्रभु बल कपिन्ह बड़ाई पाई।
जीत जीत सब रजनीचर जाई॥
१४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कपि बल दर्प सहित जुझारे।
निसिचर बिकट सकल संहारे॥
५२॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम बिभीषन कपि सब मिले।
भए सुखी श्रम सब तन हिले॥
प्रभु कृपाँ करि लंका लीन्ही।
रावन बधि सीतहि सुख दीन्ही॥
५३॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भवसागर बिनु जान॥
५४॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनिअहिं जे चित लाइ।
तिन्ह कर सुभ सब सिद्ध होइ सुंदरकांड सुनाइ॥
५५॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कलजुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥
राम नाम नर केसरी कानन।
कलि कालिअ बिष बिनासन बानन॥
५६॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
राम नाम कलि अभिमत दाता।
हित परलोक लोक पितु माता॥
राम नाम को प्रताप प्रचारो।
सब सुख दायक दुख निवारो॥
५७॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
कहत सुनत सुंदरकांड रखवारे राम।
तुलसीदास सदा भजु प्रभु अंतरजामी नाम॥
५८॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥
राम सीय रघुनंदन सहाई।
तुलसी सदा रहउ उर माहीं॥
५९॥
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यहाँ गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार प्रामाणिक हिंदी अर्थ लिखा गया है। राम भक्त हनुमान की जय।
इति श्रीरामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पंचमः सोपानः समाप्तः।
(सुन्दरकाण्ड समाप्त)॥
६०॥
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इثि श्रीरामचरितमानस का पंचम सोपान (सुन्दरकाण्ड) सम्पूर्ण हुआ। जो समस्त कलियुग के पापों का नाश करने वाला है।

13. आरती श्री रामायण जी की

श्री रामायण जी की पावन आरती — तुलसीदास जी द्वारा श्री सीतापति की कीर्ति, सकल ग्रन्थों के सार एवं मंगल भवन का गान

आरती श्री रामायण जी की।
कीरति कलित ललित सिय पी की॥
गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद।
बालमीक बिज्ञान बिसारद॥
सुक सनकादि सेष अरु सारद।
बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥
आरती श्री रामायण जी की॥
१॥
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श्री रामायण जी की आरती — श्री सीतापति की सुन्दर व पवित्र कीर्ति का गान ब्रह्मा, मुनि नारद, वाल्मीकि, शुकदेव, सनकादि, शेष और सरस्वती करते हैं तथा पवनपुत्र हनुमान की उत्तम कीर्ति का वर्णन करते हैं।
गावत बेद पुरान अष्टदस।
छओं शास्त्र सब ग्रंथन को रस॥
मुनि जन धन संतोष सुहावन।
पावन सुक शौनक मन भावन॥
जागत जोगी पावन मतिकी॥
आरती श्री रामायण जी की॥
२॥
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वेद, अठारह पुराण, छहों शास्त्र — सब ग्रन्थों का सार रामायण है। मुनियों का धन, सन्तोषकारी, पावन और शुक-शौनक के मन को भाने वाला यह ग्रन्थ योगियों के जागृत पावन बुद्धि का आधार है।
लव कुस लीला रसिक पियारी।
तुलसीदास प्रभु कीरति न्यारी॥
इहि के प्रताप मनुजन तारे।
सकल लोक भय भंजन हारे॥
गावत सुर नर मुनि सब सेवत जनम अनेक की॥
आरती श्री रामायण जी की॥
३॥
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लव और कुश की रसमयी लीला अत्यन्त प्रिय है। तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रभु की कीर्ति अनुपम है। इसके प्रताप से मनुष्यों का उद्धार होता है, सकल लोकों के भय का नाश होता है। देवता, मनुष्य और मुनि सभी अनेक जन्मों से इसकी सेवा-गान करते हैं।
मङ्गल भवन अमङ्गल हारी।
उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥
बसिए मन मंदिर में मेरे।
भरत लखन सिय सहित सवेरे॥
तुलसीदास प्रभु कृपाँ तिहारी॥
आरती श्री रामायण जी की॥
कीरति कलित ललित सिय पी की॥
४॥
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मंगल भवन, अमंगल हारी — जिनका उमा सहित महादेव जी सदा जपते हैं। हे प्रभु! भरत, लक्ष्मण और सीता जी सहित मेरे मन-मन्दिर में सदा विराजिए। तुलसीदास जी प्रभु की कृपा का गान करते हैं। श्री सीतापति की सुन्दर पवित्र कीर्ति की आरती सम्पूर्ण।
सुन्दरकाण्ड पाठ (Sunderkand) - Ramcharitmanas | VedKosh