
अर्गला स्तोत्रं
Argala Stotram
दुर्गा सप्तशती को खोलने वाला अर्गला — मार्कण्डेय पुराण से
देवता: देवी दुर्गा (Goddess Durga) | भाग: दुर्गा सप्तशती त्रयम् (कवच → अर्गला → कीलक)
Sanskrit Lyrics (मूल पाठ)
॥ श्री अर्गला स्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुरृषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतिपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।
ॐ नमश्चण्डिकायै । मार्कण्डेय उवाच ।
ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ २॥
मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ३॥
महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ४॥
धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ५॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ६॥
निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ७॥
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ८॥
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ९॥
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १०॥
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ११॥
चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १२॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १३॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १४॥
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १५॥
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १६॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १७॥
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १८॥
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १९॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २०॥
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २१॥
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २२॥
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २३॥
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २४॥
भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २५॥
तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २६॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः ।
सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् ॥ २७॥
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ॥महत्त्व
अर्गला का अर्थ है "अर्गल/बोल्ट"। यह स्तोत्र सप्तशती की गुप्त शक्तियों को "खोलने" हेतु पढ़ा जाता है। यह त्रयम् (कवच → अर्गला → कीलक) का दूसरा अंग है, जो चण्डी-पाठ से पूर्व पढ़ा जाता है। बार-बार आने वाला "रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि" शाक्त परम्परा की प्रसिद्ध प्रार्थना है।
दुर्गा सप्तशती त्रयम्
Verse-by-Verse Meaning
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ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि । जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥
oṃ jaya tvaṃ devi cāmuṇḍe jaya bhūtāpahāriṇi | jaya sarvagate devi kālarātri namo'stu te ॥ 1॥
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Victory to you, O Goddess Chamunda! Victory to you who remove the sufferings of all beings! O all-pervading Kalaratri, salutations to you again and again.
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ २॥
jayantī maṅgalā kālī bhadrakālī kapālinī | durgā śivā kṣamā dhātrī svāhā svadhā namo'stu te ॥ 2॥
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Salutations to you who manifest as Jayanti, Mangala, Kali, Bhadrakali, Kapalini, Durga, Shiva, Kshama, Dhatri, Svaha, and Svadha.
मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ३॥
madhukaiṭabhavidhvaṃsi vidhātṛvarade namaḥ | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 3॥
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Salutations to you, destroyer of the demons Madhu and Kaitabha, granter of boons to Brahma. O Mother, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ४॥
mahiṣāsuranirnāśi bhaktānāṃ sukhade namaḥ | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 4॥
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Salutations to you, destroyer of Mahishasura, giver of happiness to your devotees. Grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ५॥
dhūmranetravadhe devi dharmakāmārthadāyini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 5॥
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O Goddess who slew the demon Dhumralochana and who bestows dharma, kama, and artha, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ६॥
raktabījavadhe devi caṇḍamuṇḍavināśini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 6॥
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O Goddess who slew Raktabija and destroyed the demons Chanda and Munda, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ७॥
niśumbhaśumbhanirnāśi trilokyaśubhade namaḥ | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 7॥
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Salutations to you, destroyer of Nishumbha and Shumbha, who brings auspiciousness to all three worlds. Grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ८॥
vanditāṅghriyuge devi sarvasaubhāgyadāyini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 8॥
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O Goddess whose two feet are worshipped by all, and who bestows every good fortune, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ९॥
acintyarūpacarite sarvaśatruvināśini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 9॥
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O Goddess of inconceivable form and deeds, destroyer of all enemies, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १०॥
natebhyaḥ sarvadā bhaktyā cāparṇe duritāpahe | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 10॥
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O Aparna, who always removes the misfortunes of those who bow before you with devotion, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ११॥
stuvadbhyo bhaktipūrvaṃ tvāṃ caṇḍike vyādhināśini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 11॥
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O Chandika, destroyer of disease for those who praise you with devotion, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १२॥
caṇḍike satataṃ yuddhe jayanti pāpanāśini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 12॥
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O Chandika, ever victorious in battle, destroyer of sins, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १३॥
dehi saubhāgyamārogyaṃ dehi devi paraṃ sukham | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 13॥
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O Goddess, grant me good fortune and good health, grant me supreme happiness. Grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १४॥
vidhehi devi kalyāṇaṃ vidhehi vipulāṃ śriyam | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 14॥
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O Goddess, bestow well-being upon me, bestow abundant prosperity upon me. Grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १५॥
vidhehi dviṣatāṃ nāśaṃ vidhehi balamuccakaiḥ | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 15॥
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O Goddess, bring about the destruction of my enemies, and grant me exceeding strength. Grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १६॥
surāsuraśiroratnanighṛṣṭacaraṇe'mbike | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 16॥
Show meaningHide meaning
O Mother, whose feet are polished by the crest-jewels of both gods and demons who bow before you, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १७॥
vidyāvantaṃ yaśasvantaṃ lakṣmīvantañca māṃ kuru | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 17॥
Show meaningHide meaning
O Goddess, make me learned, make me famous, and make me prosperous. Grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १८॥
devi pracaṇḍadordaṇḍadaityadarpaniṣūdini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 18॥
Show meaningHide meaning
O Goddess who crushes the arrogance of demons with your mighty arms, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १९॥
pracaṇḍadaityadarpaghne caṇḍike praṇatāya me | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 19॥
Show meaningHide meaning
O Chandika, destroyer of the fierce pride of demons, grant to me who bow before you beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २०॥
caturbhuje caturvaktrasaṃstute parameśvari | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 20॥
Show meaningHide meaning
O four-armed Goddess, supreme sovereign praised by the four-faced Brahma, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २१॥
kṛṣṇena saṃstute devi śaśvadbhaktyā sadāmbike | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 21॥
Show meaningHide meaning
O Goddess ever praised by Sri Krishna with constant devotion, O eternal Mother, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २२॥
himācalasutānāthasaṃstute parameśvari | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 22॥
Show meaningHide meaning
O supreme sovereign Goddess, praised by Shiva, the lord of the Himalaya's daughter, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २३॥
indrāṇīpatisadbhāvapūjite parameśvari | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 23॥
Show meaningHide meaning
O supreme sovereign Goddess, worshipped with sincere devotion by Indra, the husband of Indrani, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २४॥
devi bhaktajanoddāmadattānandodaye'mbike | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 24॥
Show meaningHide meaning
O Mother, who bestows boundless, overflowing joy upon your devotees, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २५॥
bhāryāṃ manoramāṃ dehi manovṛttānusāriṇīm | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 25॥
Show meaningHide meaning
O Goddess, grant me a pleasing spouse whose disposition is in harmony with mine. Grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २६॥
tāriṇi durgasaṃsārasāgarasyācalodbhave | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 26॥
Show meaningHide meaning
O Goddess born of the mountain, who carries souls across the difficult ocean of worldly existence, grant me beauty, grant me victory, grant me fame, and destroy my enemies.
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः । सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् ॥ २७॥
idaṃ stotraṃ paṭhitvā tu mahāstotraṃ paṭhennaraḥ | saptaśatīṃ samārādhya varamāpnoti durlabham ॥ 27॥
Show meaningHide meaning
Having recited this stotram, the seeker should then recite the great stotram (the Saptashati). By duly worshipping the Saptashati in this manner, he attains a boon that is otherwise difficult to obtain.

अर्गला स्तोत्रं
Argala Stotram
दुर्गा सप्तशती को खोलने वाला अर्गला — मार्कण्डेय पुराण से
देवता: देवी दुर्गा (Goddess Durga) | भाग: दुर्गा सप्तशती त्रयम् (कवच → अर्गला → कीलक)
Sanskrit Lyrics (मूल पाठ)
॥ श्री अर्गला स्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुरृषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतिपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।
ॐ नमश्चण्डिकायै । मार्कण्डेय उवाच ।
ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ २॥
मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ३॥
महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ४॥
धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ५॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ६॥
निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ७॥
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ८॥
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ९॥
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १०॥
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ११॥
चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १२॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १३॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १४॥
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १५॥
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १६॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १७॥
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १८॥
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १९॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २०॥
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २१॥
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २२॥
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २३॥
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २४॥
भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २५॥
तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २६॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः ।
सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् ॥ २७॥
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ॥महत्त्व
अर्गला का अर्थ है "अर्गल/बोल्ट"। यह स्तोत्र सप्तशती की गुप्त शक्तियों को "खोलने" हेतु पढ़ा जाता है। यह त्रयम् (कवच → अर्गला → कीलक) का दूसरा अंग है, जो चण्डी-पाठ से पूर्व पढ़ा जाता है। बार-बार आने वाला "रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि" शाक्त परम्परा की प्रसिद्ध प्रार्थना है।
दुर्गा सप्तशती त्रयम्
श्लोक अर्थ सहित — श्लोक दर श्लोक
हर श्लोक के नीचे “अर्थ देखें” दबाकर उसका भावार्थ पढ़ें।
ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि । जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥
oṃ jaya tvaṃ devi cāmuṇḍe jaya bhūtāpahāriṇi | jaya sarvagate devi kālarātri namo'stu te ॥ 1॥
अर्थ देखेंअर्थ छिपाएँ
हे देवी चामुण्डे, तुम्हारी जय हो! हे प्राणियों के कष्टों को हरने वाली, तुम्हारी जय हो! हे सर्वव्यापी कालरात्रि देवी, तुम्हें बारम्बार नमस्कार है।
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ २॥
jayantī maṅgalā kālī bhadrakālī kapālinī | durgā śivā kṣamā dhātrī svāhā svadhā namo'stu te ॥ 2॥
अर्थ देखेंअर्थ छिपाएँ
हे जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, शिवा, क्षमा, धात्री, स्वाहा और स्वधा रूप में विराजमान देवी, तुम्हें नमस्कार है।
मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ३॥
madhukaiṭabhavidhvaṃsi vidhātṛvarade namaḥ | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 3॥
अर्थ देखेंअर्थ छिपाएँ
मधु और कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली, ब्रह्मा को वरदान देने वाली देवी को नमस्कार है। हे माता, मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ४॥
mahiṣāsuranirnāśi bhaktānāṃ sukhade namaḥ | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 4॥
अर्थ देखेंअर्थ छिपाएँ
महिषासुर का पूर्ण नाश करने वाली, अपने भक्तों को सुख देने वाली देवी को नमस्कार है। मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ५॥
dhūmranetravadhe devi dharmakāmārthadāyini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 5॥
अर्थ देखेंअर्थ छिपाएँ
धूम्रलोचन नामक असुर का वध करने वाली, धर्म, अर्थ और काम प्रदान करने वाली हे देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ६॥
raktabījavadhe devi caṇḍamuṇḍavināśini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 6॥
अर्थ देखेंअर्थ छिपाएँ
रक्तबीज का वध करने वाली, चण्ड और मुण्ड नामक असुरों का नाश करने वाली हे देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ७॥
niśumbhaśumbhanirnāśi trilokyaśubhade namaḥ | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 7॥
अर्थ देखेंअर्थ छिपाएँ
निशुम्भ और शुम्भ का पूर्ण नाश करने वाली, तीनों लोकों का कल्याण करने वाली देवी को नमस्कार है। मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ८॥
vanditāṅghriyuge devi sarvasaubhāgyadāyini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 8॥
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जिनके दोनों चरण वन्दनीय हैं, जो समस्त सौभाग्य प्रदान करने वाली हैं, हे ऐसी देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ९॥
acintyarūpacarite sarvaśatruvināśini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 9॥
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जिनका रूप और चरित्र मन से भी नहीं सोचा जा सकता, जो समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हैं, हे ऐसी देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १०॥
natebhyaḥ sarvadā bhaktyā cāparṇe duritāpahe | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 10॥
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हे अपर्णे (पार्वती)! जो भक्तिपूर्वक सदा नतमस्तक रहते हैं उनके सारे पापों-कष्टों को दूर करने वाली हे देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ११॥
stuvadbhyo bhaktipūrvaṃ tvāṃ caṇḍike vyādhināśini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 11॥
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हे चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं, उनके रोगों का नाश करने वाली हे देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १२॥
caṇḍike satataṃ yuddhe jayanti pāpanāśini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 12॥
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हे चण्डिके! जो सदा युद्ध में विजय पाने वाली और पापों का नाश करने वाली हो, हे देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १३॥
dehi saubhāgyamārogyaṃ dehi devi paraṃ sukham | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 13॥
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हे देवी! मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो, मुझे परम सुख प्रदान करो। मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १४॥
vidhehi devi kalyāṇaṃ vidhehi vipulāṃ śriyam | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 14॥
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हे देवी! मेरा कल्याण करो, मुझे प्रचुर सम्पन्नता प्रदान करो। मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १५॥
vidhehi dviṣatāṃ nāśaṃ vidhehi balamuccakaiḥ | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 15॥
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हे देवी! मेरे शत्रुओं का नाश करो, मुझे उत्तम बल प्रदान करो। मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १६॥
surāsuraśiroratnanighṛṣṭacaraṇe'mbike | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 16॥
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हे अम्बिके! देवताओं और असुरों के मुकुटों के रत्न जिनके चरणों को स्पर्श करते हैं, हे ऐसी माता! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १७॥
vidyāvantaṃ yaśasvantaṃ lakṣmīvantañca māṃ kuru | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 17॥
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हे देवी! मुझे विद्यावान, यशस्वी और लक्ष्मीवान बना दो। मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १८॥
devi pracaṇḍadordaṇḍadaityadarpaniṣūdini | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 18॥
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हे देवी! अपनी प्रचण्ड भुजाओं से दैत्यों के अहंकार को चूर करने वाली, मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १९॥
pracaṇḍadaityadarpaghne caṇḍike praṇatāya me | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 19॥
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हे चण्डिके! उग्र दैत्यों का अहंकार नष्ट करने वाली, तुम्हें नतमस्तक हुए मुझ भक्त को सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २०॥
caturbhuje caturvaktrasaṃstute parameśvari | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 20॥
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हे चतुर्भुज देवी! चतुर्मुख ब्रह्मा द्वारा स्तुति की गई हे परमेश्वरी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २१॥
kṛṣṇena saṃstute devi śaśvadbhaktyā sadāmbike | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 21॥
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हे देवी! जो श्रीकृष्ण द्वारा निरन्तर भक्तिपूर्वक स्तुति की जाती हो, हे सदा माता! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २२॥
himācalasutānāthasaṃstute parameśvari | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 22॥
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हे परमेश्वरी! हिमाचल की पुत्री पार्वती के स्वामी शिव द्वारा स्तुति की गई हे देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २३॥
indrāṇīpatisadbhāvapūjite parameśvari | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 23॥
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हे परमेश्वरी! इन्द्राणी के स्वामी इन्द्र द्वारा सच्चे भाव से पूजित हे देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २४॥
devi bhaktajanoddāmadattānandodaye'mbike | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 24॥
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हे अम्बिके! अपने भक्तजनों को उमड़ता हुआ अपार आनन्द प्रदान करने वाली हे देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २५॥
bhāryāṃ manoramāṃ dehi manovṛttānusāriṇīm | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 25॥
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हे देवी! मुझे ऐसी मनोरम पत्नी दो जो मेरे मन के अनुकूल आचरण करने वाली हो। मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २६॥
tāriṇi durgasaṃsārasāgarasyācalodbhave | rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi ॥ 26॥
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हे संसार-सागर के दुर्गम पार से उद्धार करने वाली, पर्वतराज हिमालय से उत्पन्न हे देवी! मुझे सुन्दर रूप दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः । सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् ॥ २७॥
idaṃ stotraṃ paṭhitvā tu mahāstotraṃ paṭhennaraḥ | saptaśatīṃ samārādhya varamāpnoti durlabham ॥ 27॥
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इस स्तोत्र का पाठ करने के बाद ही साधक महास्तोत्र (सप्तशती) का पाठ करे। इस प्रकार सप्तशती की सम्यक् आराधना करके वह दुर्लभ वरदान प्राप्त करता है।
Frequently Asked Questions
What is the Argala Stotram?
The Argala Stotram is a sacred Hindu devotional hymn (stotram) dedicated to Durga. VedKosh provides its complete text in Hindi and English with transliteration for regional readers.
What are the benefits of reciting the Argala Stotram?
Reciting the Argala Stotram with devotion is traditionally believed to invoke the grace of Durga, calm and focus the mind, and create an auspicious, sattvic atmosphere. It is practised as an act of bhakti (devotion) rather than for any guaranteed material outcome.
When should the Argala Stotram be recited?
The Argala Stotram can be recited during daily morning or evening worship of Durga, and especially on the deity's sacred days and festivals. A clean, quiet space and a steady, devotional mind are the main requirements.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अर्गला स्तोत्रं क्या है?
अर्गला स्तोत्रं दुर्गा को समर्पित एक पवित्र हिन्दू भक्ति स्तोत्र है। वेदकोश पर इसका पूर्ण पाठ हिंदी और अंग्रेज़ी में (क्षेत्रीय पाठकों हेतु लिप्यंतरण सहित) उपलब्ध है।
अर्गला स्तोत्रं के पाठ के क्या लाभ माने जाते हैं?
अर्गला स्तोत्रं का श्रद्धापूर्वक पाठ दुर्गा की कृपा का आह्वान करता है, मन को शांत व एकाग्र करता है और शुभ, सात्विक वातावरण बनाता है। इसे किसी निश्चित भौतिक फल की गारंटी के रूप में नहीं, बल्कि भक्ति-भाव से किया जाता है।
अर्गला स्तोत्रं का पाठ कब करना चाहिए?
अर्गला स्तोत्रं का पाठ दुर्गा की प्रातः या संध्या पूजा में, तथा विशेषकर देवता के पवित्र दिनों व पर्वों पर किया जा सकता है। स्वच्छ, शांत स्थान और स्थिर भक्ति-भाव ही मुख्य आवश्यकता है।
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