कौ पुनिम पूजा विधि (काक पूर्णिमा)
कौ पुनिम कश्मीरी पण्डितों का अनूठा पर्व है जिसमें कौओं (काक) को भोजन खिलाया जाता है। कश्मीरी परम्परा में कौआ पूर्वजों (पितरों) का दूत माना जाता है। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को परिवार के सदस्य विशेष भोजन बनाकर घर की छत पर या आँगन में कौओं को खिलाते हैं। यदि कौआ भोजन ग्रहण करे तो पितर प्रसन्न माने जाते हैं।
भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (अगस्त–सितम्बर)
प्रातःकाल — सूर्योदय के तत्काल पश्चात्
Puja Samagri (Items Required)
- चावल, दाल, सब्ज़ी (कौओं हेतु विशेष भोजन)
- रोटी के टुकड़े
- दूध-भात (दूध-चावल)
- जल पात्र
- कुमकुम, अक्षत, पुष्प
- दीपक, अगरबत्ती
Puja Procedure — Steps
भोजन तैयारी
प्रातःकाल ताज़ा भोजन बनाएँ — चावल, दाल, रोटी। एक थाली में कौओं हेतु भोजन अलग रखें। दूध-भात (दूध-चावल) भी तैयार करें।
पितृ पूजन
ठोकुर कुठ (देवस्थान) में पितरों (पूर्वजों) का स्मरण करें। दीपक-अगरबत्ती जलाएँ। अक्षत-कुमकुम चढ़ाएँ। "ॐ पितृभ्यो नमः" जपें। पितरों से परिवार की रक्षा हेतु प्रार्थना करें।
कौओं को भोजन
भोजन की थाली छत / आँगन / खुले स्थान पर रखें। कौओं को पुकारें — "काव काव" की ध्वनि करें। धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें। कौआ भोजन ग्रहण करे = पितर प्रसन्न हैं।
नवीद एवं परिवार भोजन
कौओं के भोजन ग्रहण के पश्चात् परिवार भोजन करे। नवीद (प्रसाद) बाँटें। पितरों का आभार व्यक्त करें। बड़ों के चरण स्पर्श करें।
Main Mantra
ॐ पितृभ्यो नमः । ॐ पितृ-देवताभ्यो नमः । ॐ स्वधा ।
Benefits of this Puja
कौ पुनिम से पितरों की तृप्ति, पूर्वजों का आशीर्वाद, परिवार में शान्ति-सौहार्द, पितृ दोष शान्ति।
Important Notes
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कौ पुनिम पूजा विधि (काक पूर्णिमा) कब की जाती है और शुभ मुहूर्त क्या है?
भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (अगस्त–सितम्बर) — प्रातःकाल — सूर्योदय के तत्काल पश्चात्
कौ पुनिम पूजा विधि (काक पूर्णिमा) के लिए कौन-सी पूजा सामग्री चाहिए?
चावल, दाल, सब्ज़ी (कौओं हेतु विशेष भोजन), रोटी के टुकड़े, दूध-भात (दूध-चावल), जल पात्र, कुमकुम, अक्षत, पुष्प, दीपक, अगरबत्ती
कौ पुनिम पूजा विधि (काक पूर्णिमा) में कौन-सा मंत्र जपा जाता है?
ॐ पितृभ्यो नमः । ॐ पितृ-देवताभ्यो नमः । ॐ स्वधा ।
कौ पुनिम पूजा विधि (काक पूर्णिमा) करने से क्या लाभ मिलते हैं?
कौ पुनिम से पितरों की तृप्ति, पूर्वजों का आशीर्वाद, परिवार में शान्ति-सौहार्द, पितृ दोष शान्ति।