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भगवान शिव-पार्वती, प्रकृति देवता
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हरेला पूजा विधि — गढ़वाली

Last updated: 14 June 2026

हरेला देवभूमि उत्तराखंड को सबसे प्यारो त्योहार छ। श्रावण मास की पहली तिथि मा सात अनाज (गेहूं, जौ, मक्का, धान, उड़द, गहत, सरसों) कू पंचाली मा बोई जान्दो छ अर दस दिन बाद काटी कै माथा मा रखी जान्दो छ। ये पर्व प्रकृति, हरियाली अर नई फसल को आभार व्यक्त करन कू मनाई जान्दो छ। डिकारा (मिट्टी की मूर्तियां) बणाई कै शिव-पार्वती की पूजा हूंदी छ। "जी रया जागी रया" को आशीर्वाद दिया जान्दो छ।

Occasion

श्रावण मास प्रथम दिवस (जुलाई-अगस्त)

Muhurat

हरेला बुवाई: श्रावण से 9-10 दिन पहले, काटना: श्रावण प्रथम तिथि, प्रातः

Puja Samagri (Items Required)

  • सात अनाज (गेहूं, जौ, मक्का, धान, उड़द, गहत, सरसों)
  • पंचाली (रिंगाल की टोकरी या थाली)
  • मिट्टी अर गोबर (डिकारा बनाने कू)
  • फूल-पत्ती (बुरांश, फ्योंली)
  • अक्षत (चावल), रोली, हल्दी
  • घी को दीपक
  • नैवेद्य (गुड़, फल, पूड़ी)
  • धूप-अगरबत्ती
  • जल कलश

Puja Procedure — Steps

Step 1

हरेला बुवाई

श्रावण से नौ-दस दिन पहले पंचाली (रिंगाल की टोकरी) मा मिट्टी अर गोबर बिछाओ। सातों अनाज — गेहूं, जौ, मक्का, धान, उड़द, गहत, सरसों — बो दियो। अंधेरी जगह मा रखो जहां धूप ना आवे। रोज पानी छिड़को।

Step 2

डिकारा बणाना

मिट्टी अर गोबर मिलाई कै डिकारा बणाओ — शिव-पार्वती, गणेश, कार्तिकेय की मूर्ति। गढ़वाल मा हर घर मा ये परम्परा छ। बच्चा लोग भी डिकारा बणान मा मदद करदन। सुखाई कै रंग लगाओ।

Step 3

हरेला काटना

श्रावण की पहली तिथि मा सबेरे नहाई-धोई कै पंचाली को हरेला काटो। पीली-हरी पत्तियां निकालो। ये हरियाली प्रकृति की कृपा को प्रतीक छ।

Step 4

पूजा अर अर्चना

डिकारा कू सजाओ, फूल-अक्षत-रोली चढ़ाओ, घी को दीपक जलाओ। हरेला की पत्तियां डिकारा कू अर्पित करो। धूप-अगरबत्ती लगाओ अर नैवेद्य (गुड़, फल) रखो।

Step 5

माथा मा हरेला रखना

बड़े-बूढ़े परिवार के सबन कू हरेला की पत्तियां माथा मा रखदन अर आशीर्वाद देंदन: "जी रया जागी रया, यो दिन यो बार भेटनै रया, दुब जस फैलि जाया, आकाश जस उच्च है जाया।"

Step 6

विसर्जन अर प्रसाद

पूजा के बाद डिकारा कू नदी या बहते पानी मा विसर्जन करो। प्रसाद सबमा बांटो — पूड़ी, गुड़, फल। पड़ोसी अर रिश्तेदार कू भी हरेला भेजो।

Main Mantra

ॐ नमः शिवाय।
जी रया जागी रया, यो दिन यो बार भेटनै रया,
दुब जस फैलि जाया, आकाश जस उच्च है जाया,
सिल पिसि भात खाया, जौं जस फलि जाया।

Benefits of this Puja

हरेला पूजा से प्रकृति को आशीर्वाद, नई फसल की समृद्धि, परिवार मा सुख-शांति, दीर्घायु अर स्वास्थ्य की कामना पूरी हूंदी छ। ये देवभूमि की पहचान छ।

Important Notes

• हरेला बुवाई समय मा करो — देर से बोयो तो पत्तियां ठीक ना हूंदी। • डिकारा गोबर-मिट्टी को ई बणाओ — प्लास्टिक ना वर्तो। • बड़ों से आशीर्वाद ज़रूर लेओ — ये गढ़वाली संस्कार छ। • हरेला की पत्तियां नदी मा विसर्जित करो, कूड़ा मा मत फेंको। • बच्चों कू भी डिकारा बणाना सिखाओ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरेला पूजा विधि — गढ़वाली कब की जाती है और शुभ मुहूर्त क्या है?

श्रावण मास प्रथम दिवस (जुलाई-अगस्त) — हरेला बुवाई: श्रावण से 9-10 दिन पहले, काटना: श्रावण प्रथम तिथि, प्रातः

हरेला पूजा विधि — गढ़वाली के लिए कौन-सी पूजा सामग्री चाहिए?

सात अनाज (गेहूं, जौ, मक्का, धान, उड़द, गहत, सरसों), पंचाली (रिंगाल की टोकरी या थाली), मिट्टी अर गोबर (डिकारा बनाने कू), फूल-पत्ती (बुरांश, फ्योंली), अक्षत (चावल), रोली, हल्दी, घी को दीपक, नैवेद्य (गुड़, फल, पूड़ी), धूप-अगरबत्ती, जल कलश

हरेला पूजा विधि — गढ़वाली में कौन-सा मंत्र जपा जाता है?

ॐ नमः शिवाय। जी रया जागी रया, यो दिन यो बार भेटनै रया, दुब जस फैलि जाया, आकाश जस उच्च है जाया, सिल पिसि भात खाया, जौं जस फलि जाया।

हरेला पूजा विधि — गढ़वाली करने से क्या लाभ मिलते हैं?

हरेला पूजा से प्रकृति को आशीर्वाद, नई फसल की समृद्धि, परिवार मा सुख-शांति, दीर्घायु अर स्वास्थ्य की कामना पूरी हूंदी छ। ये देवभूमि की पहचान छ।

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