व्यास महाभारत
यतो धर्मस्ततो जयः
Yato dharmastato jayah
"जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है।"
— Mahabharata
100,000+
श्लोक
18
पर्व
1 Mil.+
शब्द
Vyasa
रचयिता
विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य — पाण्डव-कौरव महायुद्ध, भगवद्गीता का उद्भव और धर्म की शाश्वत खोज।
महाभारत वेदव्यास द्वारा रचित विश्व का सबसे लम्बा काव्य है — 100,000 से अधिक श्लोक, 1 मिलियन से अधिक शब्द। यह केवल एक युद्ध-कथा नहीं, बल्कि धर्म, नीति, दर्शन और मानव-जीवन की सम्पूर्ण व्याख्या है। इसी में भगवद्गीता समाहित है — जो भारतीय दर्शन का परम ग्रन्थ है।
रचनाकाल
~3100–400 BCE (अनुमानित)
मूल भाषा
Sanskrit (Vedic)
उपग्रन्थ
भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम, नल-दमयन्ती, सावित्री
वर्गीकरण
स्मृति (इतिहास)
आदि पर्व से स्वर्गारोहण पर्व तक — सम्पूर्ण महाभारत की कथा
महाभारत के अमर पात्र — जिनकी कथाएँ आज भी प्रासंगिक हैं
युधिष्ठिर
ज्येष्ठ पाण्डव — धर्म का अवतार; सत्य के प्रति अटूट निष्ठा।
अर्जुन
सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर — भगवद्गीता का पात्र; उनका विषाद ही गीता का कारण बना।
भीम
महाबली — द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध लेने की शपथ।
श्रीकृष्ण
विष्णु-अवतार — अर्जुन के सारथि; भगवद्गीता के माध्यम से धर्म, कर्म और मोक्ष का उपदेश।
द्रौपदी
पंचपति द्रौपदी — राजसभा में उनके अपमान ने कुरुक्षेत्र युद्ध को अनिवार्य बना दिया।
भीष्म
दोनों पक्षों के पितामह — सत्यवादी और अजेय योद्धा; शर-शय्या पर राजधर्म का महान उपदेश।
कर्ण
सर्वश्रेष्ठ योद्धा — कुन्ती-पुत्र होते हुए भी सूत-पुत्र के नाम से तिरस्कृत; दुर्योधन के प्रति कृतज्ञ। महाभारत का सबसे करुण पात्र।
दुर्योधन
विरोधी पात्र — ईर्ष्या और अहंकार में फँसा; कृष्ण की शान्ति-सलाह अस्वीकार कर महायुद्ध का कारण बना।
महाभारत के चार स्तम्भ — धर्म, कर्म, गीता और नीति
धर्म परिस्थिति-सापेक्ष और जटिल है — कोई एकल नियम नहीं। युधिष्ठिर की धर्म-दुविधाएँ, कृष्ण का मार्गदर्शन और भीष्म का उपदेश बताते हैं कि धर्म को बुद्धि से समझना होता है।
यतो धर्मस्ततो जयः
Yato dharmastato jayah
Where there is Dharma, there is victory.
— Mahabharata
प्रत्येक कर्म का फल होता है। गीता का उपदेश — निष्काम कर्म — इसी सिद्धान्त की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
Karmanye vadhikaraste ma phaleshu kadachana
You have the right to perform your duty, but not to the fruits of action.
— Bhagavad Gita 2.47
भगवद्गीता (700 श्लोक, 18 अध्याय) भीष्मपर्व के भीतर है — यह कृष्ण का अर्जुन को विषाद के उत्तर में उपदेश है। महाभारत का प्राण।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
Sarva dharman parityajya mam ekam sharanam vraja
Abandoning all Dharmas, take refuge in Me alone; I will liberate you from all sins.
— Bhagavad Gita 18.66
शान्ति पर्व और अनुशासन पर्व में भीष्म का राजधर्म, दण्डनीति और मोक्षधर्म पर सम्पूर्ण उपदेश — विश्व साहित्य में नैतिकता और शासन पर सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में से एक।
न च धर्मस्य सर्वत्र शक्यः कर्तुं विनिश्चयः
Na cha dharmasya sarvatra shakyah kartum vinishchayah
It is not possible to determine Dharma with certainty in every situation.
— Mahabharata, Shanti Parva
भगवद्गीता — महाभारत का हृदय — अभी पढ़ें
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