Kand 6
लंकाकाण्ड
Lanka Kand
लंकाकाण्ड में धर्म और अधर्म का निर्णायक संग्राम, रामसेतु, रावण-वध और विजय का दिव्य उत्सव वर्णित है।
मुख्य विषय: सेतुबंधन, लंका युद्ध, रावण-वध और सीता-उद्धार
पद 1लंकाकाण्ड सेतु-निर्माण
नाम लेत भवसिन्धु सुखाहीं।
करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥
हिंदी अर्थ
राम-नाम का स्मरण भवसागर को सुखपूर्वक पार कराने वाला है; सज्जन इसे हृदय से विचारें।
पद 2लंकाकाण्ड युद्धारंभ
रिपु दल दलन राम रघुराई।
चले सुसज्जित कपि बरनाई॥
हिंदी अर्थ
रघुराज राम शत्रु-दल के संहार के लिए वानर-सेना सहित युद्धभूमि की ओर चले।
पद 3लंकाकाण्ड रावण-उपदेश
सुनु दसकंधर कहउँ पन रोपी।
बिमुख राम त्राता नहि कोपी॥
हिंदी अर्थ
रावण को समझाया गया कि जो राम से विमुख है, उसे कोई रक्षा नहीं दे सकता।
पद 4लंकाकाण्ड मेघनाद-वध
लछिमन बान लागि तन भारी।
छूटे मोह भये दुखहारी॥
हिंदी अर्थ
लक्ष्मणजी के बाण से अधर्म का पतन हुआ और धर्म की विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ।
पद 5लंकाकाण्ड रावण-वध
गिरा रावन भुवि भार उतारा।
जय जय धुनि नभ भई अपारा॥
हिंदी अर्थ
रावण के पतन से पृथ्वी का भार हल्का हुआ और आकाश में जय-जयकार गूंज उठी।
पद 6लंकाकाण्ड विजय
राम विजय सब लोक बखाना।
भए प्रसन्न सुर मुनि सुजाना॥
हिंदी अर्थ
राम की विजय को तीनों लोकों ने सराहा; देवता और मुनिजन प्रसन्न हुए।
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