📖 बालकाण्ड पाठ श्री रामचरितमानस — गोस्वामी तुलसीदास जी कृत — राम जन्म, बाललीला, सीता-स्वयंवर एवं दिव्य विवाह

1. मंगलाचरण

श्री गणेश, सरस्वती, शिव-पार्वती, गुरु एवं भगवान श्रीराम की मंगल स्तुति — रामचरितमानस के पावन आरम्भ हेतु शुभ वन्दना

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥
१ ॥
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वर्णों (अक्षरों), अर्थ-समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को रचने वाली माता सरस्वती और श्री गणेश जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥
२ ॥
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श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप भवानी-शंकर को प्रणाम करता हूँ, जिनके बिना सिद्ध पुरुष भी अपने हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं देख पाते।
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥
३ ॥
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ज्ञानमय, नित्य, शंकर-स्वरूप गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ, जिनके आश्रय से टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दनीय होता है।
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥
४ ॥
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सीता-राम के गुणसमूह रूपी पवित्र वन में विहार करने वाले, विशुद्ध ज्ञान-सम्पन्न कविश्वर वाल्मीकि और कपीश्वर हनुमान जी को प्रणाम करता हूँ।
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥
५ ॥
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उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली, सब प्रकार का कल्याण करने वाली श्री रामचन्द्र जी की प्रिया सीता जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
दोहा— बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥
१ ॥
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मैं गुरु महाराज के चरण-कमलों की वन्दना करता हूँ जो कृपा के समुद्र और नर रूप हरि हैं। उनके वचन सूर्य की किरणों के समूह हैं, जो महामोह रूपी गहन अन्धकार को नष्ट करते हैं।
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू।
समन सकल भवरूज परिवारू॥
१ ॥
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मैं गुरु के चरण-कमलों की रज (धूलि) की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि, सुगन्ध और सरस अनुराग से युक्त है। वह अमृत की जड़ के सुन्दर चूर्ण के समान है, जो समस्त भव-रोगों के परिवार को नष्ट करती है।
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती।
मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी।
किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥
२ ॥
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वह पुण्यात्माओं के लिए भगवान शंकर के शरीर की निर्मल विभूति है, जो सुन्दर मंगल और आनन्द की जन्मदात्री है। भक्तों के सुन्दर मन रूपी दर्पण का मैल हरने वाली है और उसका तिलक लगाने से गुणों का समूह वश में होता है।
श्रीगुरु पद नख मनि गन जोती।
सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू।
बड़े भाग उर आवइ जासू॥
३ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
श्रीगुरु के चरण-नखों की मणियों की ज्योति का स्मरण करने से हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है। वह प्रकाश मोह रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाला है। बड़े भाग्य से वह हृदय में आता है।
उघरहिं बिमल बिलोचन ही कें।
मिटहिं दोष दुख भव रजनी कें॥
सूझहिं राम चरित मनि मानिक।
गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥
४ ॥
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उस ज्योति से हृदय की निर्मल आँखें खुल जाती हैं, भव-रूपी रात्रि के दोष और दुःख मिट जाते हैं और राम-चरित रूपी मणि-माणिक्य सूझने लगते हैं — गुप्त और प्रगट जहाँ जो जिस खान में है।
दोहा— बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥
(पुनः स्मरण)
हिंदी अर्थ दिखाएँ
गुरु चरण-कमल की पुनः वन्दना — जो कृपा के सागर और नर रूप हरि हैं, जिनके वचन सूर्य-किरणों के समूह की भाँति महामोह के घोर अन्धकार को मिटाते हैं।
नीलसरोरुह स्यामतनु, सेषजटि छबि सिर।
नउधम दइदम दंडधर, अस मुनि तुलसी हिर॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
नील कमल के समान श्यामवर्ण शरीर, शेष नाग के समान जटा शिर पर धारण किये, नव-धर्म और दम-दण्ड धारी — ऐसे मुनि तुलसीदास(गुरु) को मैं हृदय में बसाता हूँ।
बंदउँ बाल रूप सोई रामू।
सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
मैं उन्हीं बालरूप श्रीराम की वन्दना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त होती हैं।
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
श्री गुरु के चरण-कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करके, मैं श्री रघुनाथ जी के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) देने वाला है।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस विकार॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
अपने शरीर को बुद्धिहीन जानकर मैं श्री हनुमान जी का स्मरण करता हूँ। हे पवनकुमार! मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए तथा मेरे क्लेश और विकार दूर कीजिए।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
हे ज्ञान और गुणों के सागर हनुमान जी, आपकी जय हो! हे तीनों लोकों में प्रकाशमान कपीश्वर, आपकी जय हो!

2. कथा प्रारम्भ — शिव-पार्वती संवाद

भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को श्रीराम की दिव्य कथा सुनाना — रामचरितमानस की पावन कथा का शुभारम्भ

मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥
१ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
वे मंगल के भवन और अमंगल के हरने वाले हैं; वे दशरथ जी के आँगन में विहार (लीला) करने वाले प्रभु श्रीराम मुझ पर कृपा करें।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सब मनुष्य आपस में प्रेम करते हैं और वेद-नीति में निरत होकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा।
बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
शम्भु (शिव) ने यह सुन्दर चरित्र (रामकथा) रचा और फिर कृपा करके उमा (पार्वती) जी को सुनाया।
सोइ बिचारि सयानेन्हि रामकथा अति सार।
शिब आगें उमा कहइ रघुपति चरित उदार॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यही विचार कर ज्ञानी लोग रामकथा को अत्यन्त सार मानते हैं। शिव जी के सामने उमा जी श्री रघुनाथ जी के उदार चरित्र कहती हैं।
एक बार त्रेता जुग माहीं।
संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
एक बार त्रेतायुग में शम्भु (शिव जी) कुम्भज ऋषि (अगस्त्य) के पास गये।
पूछा चरित सिंधु रघुनाथा।
कहेउ मुनीस सकल रघुनाथा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
शिव जी ने रघुनाथ के चरित्र-सागर को पूछा और मुनीश्वर अगस्त्य ने सम्पूर्ण रघुनाथ-चरित सुनाया।
कहत सुनत रघुनाथ गुन, सिव समाधि भइ जाइ।
एहि बिधि कछु काल चलेउ, दुहुँ परम सुख पाइ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
रघुनाथ जी के गुण कहते-सुनते शिव जी को समाधि लग गयी। इस प्रकार कुछ काल बीता, दोनों ने परम सुख प्राप्त किया।
कासीं सिव बसहिं सुख चारी।
दसानन पुनि लीन्ह त्रिपुरारी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
काशी में शिव जी सुखपूर्वक निवास करते हैं। इधर दशानन (रावण) पुनः त्रिपुरासुर की तरह उन्मत्त हो गया।
रामकथा सुंदर कर तारी।
संसय बिहग उड़ावनिहारी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सुन्दर रामकथा ताली बजाने के समान है — जो संशय रूपी पक्षियों को उड़ा देती है।
उमा कहइ तुम्ह कथा सुहाई।
एक बार कहहु मोहि बुझाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
उमा (पार्वती) जी कहती हैं — हे प्रभु! यह सुन्दर कथा एक बार मुझे विस्तार से समझाकर कहिए।
कहहु राम कर चरित बिसद रघुबर अनुखन।
बिनु अघ तजी सिरोमनि सीता॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
हे प्रभु! श्री रघुनाथ जी का विस्तृत और निर्मल चरित्र सुनाइए — वे जिन्होंने बिना किसी दोष के शिरोमणि सीता जी का त्याग किया।
जौं तुम्हरें मन बिस्वास।
होइ राम पद प्रीति निवास॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यदि तुम्हारे मन में विश्वास है तो राम के चरणों में प्रीति का सच्चा निवास होगा।
बहुरि सप्रेम कहइ रघुराई।
श्रोता बकता ज्ञानि समुदाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
फिर प्रेमपूर्वक रघुनाथ जी कहते हैं — श्रोता और वक्ता दोनों ज्ञानी होने चाहिये अर्थात् दोनों में योग्यता होनी चाहिये।
नाम अनीह अनेक गुन अमित न बरने जाइ।
श्रवण सुखद सब संतन हित शिव तजि कारन कोइ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
भगवान का नाम निष्काम है और अनन्त गुणों से युक्त है, जो कहे नहीं जा सकते। वह कानों को सुखदायी और सब सन्तों का हितकारी है। शिव जी को छोड़कर इसका कारण कौन बता सकता है?

3. अवतार कारण

भगवान श्रीराम के अवतार के दिव्य कारण — रावण का अत्याचार, पृथ्वी एवं देवताओं की प्रार्थना तथा नारद जी का शाप-प्रसंग

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
गो द्विज हितकारी जय अशुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
देवताओं के नायक, भक्तों को सुख देने वाले, शरणागतों के रक्षक भगवान की जय हो! गौ-ब्राह्मणों के हितकारी, दैत्यों के शत्रु, लक्ष्मी के प्रिय पति की जय हो!
पिता दसरथ माता कौसल्या।
बिश्व बिदित तेई पुनित सुकीरति कल्या॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
पिता दशरथ और माता कौसल्या — संसार भर में विख्यात उनकी श्रेष्ठ पवित्र कीर्ति है।
सो भगवान अभिराम अप्रतिम रूप गुनधाम।
कारन कवन रूप धरि नर अवतारी राम॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
वे सुन्दर, अनुपम रूप और गुणों के धाम भगवान हैं — किस कारण उन्होंने नर रूप धारण कर अवतार लिया?
जब जब होइ धरम कइ हानी।
बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी।
सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
१ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जब-जब धर्म की हानि होती है, नीच और अभिमानी असुर बढ़ जाते हैं, वे ऐसी अनीति करते हैं जो बरनी नहीं जा सकती — ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं।
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥
२ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
तब-तब कृपानिधि प्रभु विविध शरीर धारण करके सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।
असुर अनेक अजय सँसारा।
तिन्ह कें कारन अवतार प्रभु धारा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
संसार में अनेक अजेय असुर हुए — उनके कारण प्रभु ने अवतार धारण किया।
रावन नाम प्रतापी भारी।
तेजमय तन तपबल अतिकारी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
रावण नाम का अत्यन्त प्रतापी राक्षस — तेजस्वी शरीर वाला और तपोबल से अति शक्तिशाली।
तीनिहुँ पुर बासी नर नारी।
सो सुख संपति काहुँ न बारी॥
सब सुन्दर अरु सब गुन ग्यानी।
धरम निरत सब बेद बखानी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
तीनों पुरों (अयोध्या, मिथिला, लंका) के निवासी नर-नारी — उनके सुख और सम्पत्ति को कोई रोक नहीं सकता। सब सुन्दर, सब गुणज्ञानी, सब वेदों में बखाने गए धर्मपरायण हैं।
सुनु गिरिजा हरि चरित सुहाये।
बिपुल बिसद निगमागम गाये॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई।
इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥
१ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
हे गिरिजा (पार्वती) सुनो! हरि के सुन्दर चरित्र जो अनेक, निर्मल और वेद-आगमों ने गाए हैं। हरि के अवतार का जो हेतु (कारण) है, उसे 'ऐसा ही है' ऐसा ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता।
राम अनंत अनंत गुनानी।
जन्म कर्म अनंत जग जानी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
श्रीराम अनन्त हैं, अनन्त गुणों वाले हैं। उनके जन्म और कर्म भी अनन्त हैं — ऐसा जगत जानता है।
दोहा— राम एक तापस तिय देखी।
उपजा अति अनुराग बिसेषी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
एक बार श्रीराम ने एक तापसी (तपस्विनी) स्त्री को देखा — तब अत्यन्त विशेष अनुराग उत्पन्न हुआ।
नारद गए बिष्नु के पासा।
गावत राम सुजस बिस्वासा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
नारद विष्णु के पास गए और विश्वासपूर्वक श्रीराम का सुन्दर यश गाने लगे।
बिप्रसाप गुर साप सुनाए।
श्री प्रभु अवतार तब लाए॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
ब्राह्मण के शाप और गुरु के शाप सुनाए गए — तब श्री प्रभु ने अवतार धारण किया।
जय जय जय सदा सुजसु सुर भूषन।
भजहु प्रनत पालक रघुभूषन॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सदा सुन्दर यश वाले, देवताओं के आभूषण, शरणागत-पालक रघुभूषण की जय हो, जय हो, जय हो! उन्हें भजो।
एहि बिधि जन्म कर्म हरि केरे।
सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
इस प्रकार हरि के जन्म और कर्म सुन्दर, सुखद और अनेक विचित्र प्रकार के हैं।

4. राम जन्म

अयोध्या में भगवान श्रीराम का दिव्य प्राकट्य — माता कौसल्या का आनन्द, गुरु वशिष्ठ द्वारा नामकरण संस्कार एवं मंगल उत्सव

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
१ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
कृपालु, दीनों पर दया करने वाले, कौसल्या के हितकारी प्रभु प्रकट हुए। उनका अद्भुत रूप देखकर माता हर्षित हुईं और मुनियों का मन हर गया।
लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥
२ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
नेत्रों को आनन्द देने वाले, श्यामवर्ण शरीर, चारों भुजाओं में अपने आयुध धारण किये, भूषण-वनमाला से शोभित, विशाल नेत्र — ऐसे शोभा के सागर खरारि (राक्षसों का नाश करने वाले) प्रकट हुए।
कर जोरी अस्तुती करइ सपरम बिनय सुनाइ।
काटहु पास देखाडहु सोइ सुम्रत जग सुखदाइ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
माता कौसल्या हाथ जोड़कर स्तुति करती हैं, अत्यन्त विनय से कहती हैं — हे प्रभु! बन्धन काटकर वही रूप दिखाइए जो जगत को सुख देने वाला है।
इच्छामय नर बेषु संवारा।
बालकलीला अनूपम दरसावा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
इच्छामय प्रभु ने मनुष्य का वेष सजाया और अनुपम बाल-लीला दिखायी।
तब प्रभु माँग भरि बर मागी।
सुत बिष्णुहि चहउँ बर आगी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
तब प्रभु ने माँ से कहा कि वर माँगो — माँ ने कहा कि मैं आपको पुत्र रूप में ही चाहती हूँ, हे विष्णु!
मातु पिता गुर गौरव गाथा।
बिनय करत प्रभु फिरत अवधपुर॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
माता-पिता और गुरु की गौरव-गाथा सुनता हुआ, विनय करता हुआ — प्रभु अवध नगरी में विचरण करने लगे।
नामकरनु चलि आवा बादित्य ग्रह।
मुनिबर बसिष्ठ तब आए राजद्वार॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
नामकरण संस्कार का शुभ समय आ पहुँचा और श्रेष्ठ मुनि वशिष्ठ जी राजद्वार पर पधारे।
दोहा— रामु लखनु भरतु शत्रुघनु।
ध‌री नाम मुनिराया।
राजभवन उत्सव बढ़ा अनन्द न जाइ कहा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
मुनिराज वशिष्ठ ने राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न — ये नाम रखे। राजभवन में उत्सव बढ़ गया, आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता।
बालचरित हरि बहु बिधि कीन्हा।
अति अनंद दासरथिहि दीन्हा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
हरि ने अनेक प्रकार की बाल-लीलाएँ कीं और दशरथ जी को अत्यन्त आनन्द दिया।
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥
२ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
ब्राह्मण, गौ, देवता और सन्तों के हित के लिए प्रभु ने मनुष्य अवतार लिया। अपनी इच्छा से निर्मित शरीर धारण करने वाले वे माया और गुणों से परे हैं।
अवधपुरी सोहइ सरजू तीरा।
सकल लोक देखत बनु बीरा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सरयू नदी के तीर पर अवधपुरी शोभित हो रही है — सब लोक सुन्दर और वीर (बालक) को देखने आ रहे हैं।
दोहा— सुंदर स्यामल बारुनी बिभुषित अवधपुरी।
सकल पुर दरसन हित आवहिं नर नारी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सुन्दर श्यामवर्ण बालक से अलंकृत अवधपुरी है — सम्पूर्ण नगर के दर्शन हेतु नर-नारी आते हैं।
एहि बिधि राम जन्म वर्णन किय।
जन मन आनंद उपजावन हित॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
इस प्रकार रामजन्म का वर्णन किया गया — भक्तों के मन में आनन्द उपजाने के लिए।

5. बालचरित

भगवान श्रीराम और उनके भाइयों की मनमोहक बाल-लीलाएँ — दिव्य खेल, गुरु वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा-दीक्षा

बचपन कें सुभ चरित अनूपा।
रिझि मुनि सिद्ध तपी नर भूपा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
बचपन के सुन्दर अनुपम चरित्र देखकर मुनि, सिद्ध, तपस्वी, मनुष्य और राजा — सब रीझ गए।
मुरुली बजाइ सखन संग खेलत ब्रज गली।
देखत नगर बासी सब मोद मंगल भली॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
मुरली बजाते हुए, सखाओं के साथ गलियों में खेलते हुए — नगरवासी देखकर आनन्द और मंगल से भर जाते हैं।
एक बार प्रभु आनन देही।
बाल सखा सब आगे जेही॥
मुख मँह सकल ब्रह्मांड दिखावा।
माता अचंभित हृदय सुहावा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
एक बार प्रभु ने मुख खोला और सब बालसखा आगे देख रहे — मुख में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड दिखाया; माता का हृदय विस्मित और प्रसन्न हो गया।
भोजन करत बोल जब माता।
तब प्रभु आवत धाइ सनाता॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जब माता भोजन के लिए बुलाती हैं, तब प्रभु दौड़ते हुए आते हैं — ऐसी उनकी सनातन लीला है।
चारिउ भाइ सबद गुन रूपा।
सिला एक एक प्रभु अनूपा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
चारों भाई शब्द, गुण और रूप में शिला (अडिग) और एक-से-एक अनुपम हैं।
खेलत थके तात अंकहिं आवत।
मातु गोद में चूमत सोहावत॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
खेलते-खेलते थक जाते हैं तो पिता की गोद में आते हैं; माता गोद लेकर चूमती हैं — यह दृश्य अत्यन्त सुहावना लगता है।
प्रात काल उठि के दोउ भाई।
मातु पिता पद बंदन जाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
प्रातःकाल उठकर दोनों भाई (राम-लक्ष्मण) माता-पिता के चरणों की वन्दना करने जाते हैं।
दोहा— रघुपति चरित सुनत सब हरषत बारहिं बार।
मानस तनु पुलकेहिं नयन बहहिं जल धार॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
रघुपति के चरित्र सुनकर सब बार-बार हर्षित होते हैं। मानस (मन) में रोमांच होता है और नेत्रों से जल की धारा बहती है।
गुरुगृह गए पढ़न रघुराई।
अल्पकाल बिद्या सब आई॥
३ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
रघुनाथ जी गुरु के घर (गुरुकुल) पढ़ने गए और अल्प काल में ही सब विद्या सीख ली।
सिखे चारत बेद सब ज्ञाना।
सकल कला बिद्या गुन नाना॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
चारों वेद और सम्पूर्ण ज्ञान सीखा — समस्त कला, विद्या और अनेक गुणों में निपुण हुए।
चारिउ बेद पढ़े प्रभु जाना।
सबहि चरित सुनिकें सुख माना॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
प्रभु ने चारों वेद पढ़ लिये — सबने उनके चरित सुनकर सुख माना।
बिद्या बिनय निपुन गुन सीला।
जोबन श्याम कमल मन लीला॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
विद्या, विनय, गुण, शील और निपुणता से सम्पन्न — श्याम कमल जैसे यौवन और मनमोहक लीला।

6. विश्वामित्र आगमन

महामुनि विश्वामित्र का राजा दशरथ के दरबार में आगमन, राम-लक्ष्मण को यज्ञ-रक्षा हेतु अपने साथ ले जाना एवं दिव्य अस्त्र-विद्या प्रदान करना

विश्वामित्र महामुनि रायू।
आए दसरथ केरें द्वारू॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
महामुनि राजा विश्वामित्र दशरथ जी के द्वार पर आये।
आश्रम रखवारे दुइ बारा।
चाहत मुनि पठवत रघुबारा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
आश्रम की रक्षा के लिए दो बालकों को चाहते हैं — मुनि ने कहा कि राम और लक्ष्मण को भेजिए।
सुनत दसरथहि भयउ न भावा।
सुत बियोग पुनि मन डर लावा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सुनकर दशरथ जी को अच्छा नहीं लगा — पुत्र-वियोग के विचार से मन में डर लगा।
बसिष्ठ कहा नृप भय तजि ताता।
कृपानिधान राम भए ज्ञाता॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
वशिष्ठ जी ने कहा — हे तात (राजन्)! भय छोड़िये; कृपानिधान राम सर्वज्ञ हैं (वे रक्षा करने में समर्थ हैं)।
दोहा— दीन्हे भूप रिषिहि सुत बचन मानि समुझाइ।
पुरजन ह्वै आनंद सब हियँ हरषत रघुराइ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
राजा ने ऋषि को समझा-बुझाकर पुत्रों को दिया। नगरवासी सब आनन्दित हुए और रघुनाथ जी भी हृदय में हर्षित हैं।
पठए राम लखन बन जाहीं।
मुनि तब ज्ञान कृपा बहु पाहीं॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
राम और लक्ष्मण को वन भेजा — मुनि ने तब बहुत ज्ञान और कृपा प्रदान की।
बल अतुलित अस्त्र सब दीने।
बिद्यावान करि दुहुँ बारा कीने॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
अतुल बल देने वाले सब अस्त्र दिये — दोनों बालकों को विद्यावान बना दिया।
नदी तीर मुनि आश्रम अति पावन सुहाइ।
राम लखन सिय सोहत तहँ जनु कमल पराइ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
नदी के तट पर मुनि का अत्यन्त पवित्र और सुहावना आश्रम है। राम-लक्ष्मण वहाँ ऐसे शोभित होते हैं जैसे कमलों के मध्य विराजमान हों।
मुनिबर दीन्ह बला अतिबला।
लखन राम उर धरि मख साला॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
श्रेष्ठ मुनि ने बला और अतिबला विद्या दी — राम और लक्ष्मण ने यज्ञशाला को हृदय में धारण किया।
दोहा— पुनि मुनि अस्त्र सस्त्र सब दीन्हे।
श्रीराम लखन भुजबल सुख कीन्हे॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
फिर मुनि ने समस्त अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये — श्रीराम और लक्ष्मण जी ने भुजबल से सबको सुखी किया।

7. ताड़का-वध एवं सिद्धाश्रम

श्रीराम द्वारा राक्षसी ताड़का का वध, मारीच-सुबाहु का संहार एवं सिद्धाश्रम में पावन यज्ञ की रक्षा

पुनि प्रभु गए सिद्ध आश्रमहिं।
करि मुनि रिच्छ निवारन सम्भ्रमहिं॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
फिर प्रभु सिद्धाश्रम गये और मुनियों के भय तथा राक्षसों के उपद्रव को दूर किया।
ताड़का आइ प्रबल रन मांडि।
राम कृपा सर मारि बिहांडि॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
ताड़का आकर प्रबल युद्ध करने लगी — श्रीराम ने कृपापूर्वक बाण मारकर उसका वध किया।
महामुनि बिस्वामित्र बड़ भयउ।
कीरति बरनि राम गुन गयउ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
महामुनि विश्वामित्र अत्यन्त प्रसन्न हुए और श्रीराम के गुणों की कीर्ति का वर्णन करने लगे।
बिघ्न बिनास किए बहु भारी।
यज्ञ समाप्त भई सुखकारी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
बहुत बड़े विघ्नों का नाश किया — यज्ञ सुखकारी रूप से सम्पन्न हुआ।
मारीच सुबाहु मद मंदन।
मुनि मख रच्छक भो रघुनंदन॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
मारीच और सुबाहु का मद मर्दन किया — रघुनन्दन मुनियों के यज्ञ के रक्षक बने।
मारीचहिं मानब बाना मारा।
सत जोजन परेउ सो पारा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
मारीच को मानव-बाण से मारा — वह सौ योजन दूर जा गिरा।
सुबाहु भुजा उखारि गिरावा।
रघुबीर बिपुल बल देखावा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सुबाहु की भुजा उखाड़कर गिरायी — रघुवीर ने विपुल बल दिखाया।
पुनि मुनि सकल गाइ गुन ग्रामा।
दीन्ह असीस बिबिधि बिधि रामा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
फिर सब मुनियों ने गुण-समूह गाया और श्रीराम को विविध प्रकार से आशीर्वाद दिया।
दोहा— मुनि कहेउ सुनहु सुत राम लखन सुख खानि।
जनकपुर मिथिला बनी तहाँ चलहु बिधि जानि॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
मुनि ने कहा — सुनो पुत्र राम और लक्ष्मण, हे सुख की खान! जनकपुर (मिथिला) सज गया है, वहाँ चलो — विधि (ईश्वर) जानते हैं।
यज्ञ भूमि देखावहु तात।
सब मुनि सिद्ध आवत बहु भ्रात॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
हे तात! यज्ञभूमि दिखाऊँ — बहुत मुनि और सिद्ध वहाँ आ रहे हैं।

8. अहल्या उद्धार

भगवान श्रीराम के पावन चरण-स्पर्श से अहल्या का गौतम ऋषि के शाप से उद्धार — पतित-पावन नाम की सार्थकता

गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
गौतम ऋषि की पत्नी (अहल्या) शाप के वश शिला-शरीर धारण किये धीरज रखती हुई, श्रीराम के चरण-कमलों की रज चाहती हैं — हे रघुवीर कृपा कीजिए।
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥
१ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
पवित्र पैर के स्पर्श करते ही, शोक-नाशक प्रभु के चरण पाकर — तपोराशि (अहल्या) प्रकट हो गयीं। रघुनायक को सामने देखकर, जो भक्तों को सुख देने वाले हैं, वे हाथ जोड़कर सम्मुख खड़ी हो गयीं।
अति प्रेम अधिकाइ पुलक सरीर मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिशय बड़भागिनी चरन सरोज सुमिरत अहनिसी॥
२ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
अत्यन्त प्रेम की अधिकता से शरीर पुलकित हो गया — मुख से वचन नहीं निकलता। अत्यन्त बड़भागिनी हैं जो रात-दिन चरण-कमलों का स्मरण करती हैं।
धन्य धन्य मैं धन्य बिनु पद रज करि अनुगामिन।
बिमल बिलोचन बिमल मन जान पतित पावन राम॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
धन्य-धन्य मैं धन्य — प्रभु के चरण-रज की अनुगामिनी बनी। विमल नेत्र और विमल मन — जानिये पतित-पावन श्रीराम हैं!
जोरि पानि अस्तुति कीन्हा।
तब गौतम गृह आनन्द लीन्हा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
हाथ जोड़कर अहल्या ने स्तुति की — तब गौतम ऋषि के गृह में आनन्द छा गया।
गौतम मुनि पुनि आश्रम आए।
देखत राम परम सुख पाए॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
गौतम मुनि फिर आश्रम में आये — श्रीराम को देखकर परम सुख प्राप्त किया।
प्रभुहि मिले विप्रवर पावन।
स्तुति करि अस्तुति आनंद भावन॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
पवित्र ब्राह्मणश्रेष्ठ (गौतम) प्रभु से मिले — स्तुति करने लगे, आनन्द-भाव से भावित हुए।
जेहि पद रज चिंत अहल्या पाई।
सोइ पद पावन बार बार सिर नाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जिस चरण-रज को चाहकर अहल्या ने पाया, उसी पावन चरण को बार-बार सिर नवाकर प्रणाम किया।
दोहा— राम कृपा सम काहु न कृपालु जगमाहीं।
अहल्या उधारन प्रभु कथा अगम सब काही॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जगत में श्रीराम की कृपा के समान कोई कृपालु नहीं है — अहल्या-उद्धार की प्रभु-कथा सबके लिए अगम (गूढ़) है।
एहि बिधि अहिल्या उद्धार कीन्ह रघुबंस बिभूषन।
पतितपावन नाम तेहि सत्य कीन्ह भगवान॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
इस प्रकार रघुवंश-भूषण श्रीराम ने अहल्या का उद्धार किया और 'पतित-पावन' नाम को सत्य किया भगवान ने।

9. जनकपुर आगमन

श्रीराम और लक्ष्मण का जनकपुर (मिथिला) आगमन — नगरवासियों का मोहित होना, सीता-राम का प्रथम दर्शन एवं प्रेम का उदय

आगे जाइ जनक पुर पावा।
ब्रह्मानंद मुनिन्ह मन भावा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
आगे चलकर जनकपुर पहुँचे — ब्रह्मानन्द का वातावरण मुनियों के मन को भाया।
सुंदर बनु देखत बन जाई।
रामहि मिथिला प्रीतम भाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सुन्दर वन को देखते हुए वन में गए — मिथिला श्रीराम को अत्यन्त प्रिय लगी।
मिथिला पुर अति सोभा बनी।
देखत नगरी बहुत कर कनी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
मिथिलापुर अत्यन्त शोभा से सजा हुआ है — नगरी देखने में बहुत कंचन (स्वर्ण) जैसी है।
दोउ कुमार देखन सब जाहीं।
नगर नारि नर बालक बराहीं॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सब लोग दोनों कुमारों को देखने जाते हैं — नगर की नारी, पुरुष और बालक सब एक-दूसरे को रोकते हुए देखते रहते हैं।
रघुपति सुंदरता अवलोकि।
सकल लोक नर नारिन्ह रोकि॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
रघुपति की सुन्दरता को देखकर — सम्पूर्ण लोक के नर-नारी रुककर देखते रह जाते हैं।
जनक नगर सोहत दोउ भाई।
जनु बिरंचि कृति सुषमा छाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जनक-नगर में दोनों भाई ऐसे शोभित हो रहे हैं जैसे ब्रह्मा की श्रेष्ठ रचना की शोभा छा गई हो।
राम लखन बिलोकत नगर नारी।
बदन कमल जनु बिधु उजियारी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
राम और लक्ष्मण को नगर की नारियाँ देखती हैं — उनका कमल-मुख ऐसे प्रकाशित है जैसे चन्द्रमा की चाँदनी।
कहहिं लोग सुंदर बर दोऊ।
मुनिबर सखा कहाँ कर कोऊ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
लोग कहते हैं — ये दोनों सुन्दर वर (कुमार) कहाँ के हैं? ये मुनिश्रेष्ठ के साथी कौन हैं?
नयन लाभ सम नहिं कछु आजू।
दरसन राम लखन सुखराजू॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
आज नेत्रों के लाभ के समान कुछ भी नहीं है — श्रीराम और लक्ष्मण के दर्शन सुख के राजा हैं।
दोहा— सखि सबु कीन्ह सिंगारु तुम्ह सब लागहु पूजन।
राम लखन के दरस कि हेतु बड़ा रघु भूषन॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
हे सखी! सब श्रृंगार किया, तुम सब पूजन में लग जाओ — राम-लक्ष्मण के दर्शन का हेतु बड़ा है, वे रघुवंश के भूषण हैं।
पुनि जानकी देखन भजु जानि।
मन प्रसन्न भइ रघुकुलमानि॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
फिर जानकी (सीता) जी को जानकर दर्शन करने गए — रघुकुलमणि को मन प्रसन्न हो गया।
सीता राम परस्पर देखा।
नयन नेह जनु बरसत मेहा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सीता और राम ने परस्पर देखा — नेत्रों से स्नेह बरसा, मानो वर्षा हो रही हो।
जनक सभा सुनि कथा सुभ सीता राम बिबाह।
सकल लोग आनन्द भरे नहिं पावत मन चाह॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जनक की सभा में सीता-राम विवाह की शुभ कथा सुनकर सब लोग आनन्द से भर गए — मन की चाह पूरी नहीं होती (और सुनना चाहते हैं)।
सीता मन अनुराग बढ़ावा।
देखि राम रघुबंस निगम गावा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सीता जी के मन में अनुराग बढ़ता गया — श्रीराम को देखकर रघुवंश का वेद गान करने लगे।
दोहा— राम सीय सखीं सँग देखि जनकपुर लोग।
सकल सोच बिसराइ बढ़ा प्रेमु अनुराग सजोग॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सखियों सहित सीता और राम को देखकर जनकपुर के लोग — सब चिन्ता भूलकर प्रेम और अनुराग बढ़ाने लगे।

10. धनुष-यज्ञ एवं सीता-स्वयंवर

श्रीराम द्वारा सहज ही शिव-धनुष का भंजन, सीता जी का वरण — दिव्य जयमाला, देवताओं की दुंदुभी एवं सम्पूर्ण लोक में उत्सव

सिवधनु राखेउ जनक दरबारा।
अति भारी भासुर संसारा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
शिव-धनुष जनक के दरबार में रखा गया — वह अत्यन्त भारी और संसार में प्रसिद्ध है।
जेहि सिव धनु पर बरइ कुमारी।
सोइ जानकी बर पाइ सँवारी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जो शिव-धनुष पर वरमाला डालेगा — उसी को जानकी वर के रूप में स्वीकार करेंगी।
सकल भूपन्ह मन कीन्ह बिचारू।
तोरब धनुष न मारन हारू॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सब राजाओं ने मन में विचार किया — इस धनुष को तोड़ने वाला कोई नहीं है।
राजन बहुत आए सब देसा।
पन करि हिय हरषित नरनेसा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
बहुत राजा सब देशों से आये — मन में प्रण करके राजा हर्षित हो रहे हैं।
प्रथम उठे राजन बलवाना।
कठिन भासत धनु सिव बाना॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
पहले बलवान राजा उठे — शिव-धनुष कठिन और भासमान है।
टरत न भारी धनुष तब राजन्ह होइ निरास।
रहि ससोच सब सभा तब कीन्ह विश्वामित्र हुलास॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
भारी धनुष टलता (हिलता) नहीं — तब राजा निराश हो गए। सारी सभा सोच में पड़ गयी, तब विश्वामित्र ने राम को संकेत कर उत्साह व्यक्त किया।
गुरु अनुसासन पाइ सुजाना।
उठे राम सब सभा समाना॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
गुरु की आज्ञा पाकर सुजान (चतुर) श्रीराम उठे — सारी सभा एकचित्त हो गयी।
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।
चितई सीय कृपानिधान जानी बिकल बिसेषि॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
श्रीराम ने सब लोगों को देखा — वे चित्र में अंकित से प्रतीत हो रहे थे। कृपानिधान ने सीता जी की ओर देखा और उन्हें विशेष व्याकुल जाना।
दीन्ही गुरूहि प्रनामु तब चलेउ तुरत उषीर।
सकल सभहिं बर दीन्ही बिदा बिप्र मतिधीर॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
गुरु को प्रणाम किया और तुरन्त आगे बढ़े — सम्पूर्ण सभा ने बुद्धिमान ब्राह्मणों (मुनियों) से विदा पायी।
उठाइ अस राम लीलाहीं।
सिव धनु तोरा मध्य सभाहीं॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
श्रीराम ने लीलापूर्वक (सहज ही) सभा के मध्य शिव-धनुष उठाया और तोड़ दिया।
भंजेउ चाप राम सहजहीं।
देखत बिस्मय सभहिं सबहीं॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
श्रीराम ने सहज ही धनुष भंग कर दिया — देखकर सभा में सबको विस्मय हुआ।
भयउ भूमिगत भारी सब्दु।
डगमगानहिं दिग्गज थरहरानहिं।
सुर दुंदुभी बजी सब ठाँव॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
भारी शब्द (ध्वनि) हुआ जो पृथ्वी पर गूँजा — दिग्गज डगमगाए, थरथराए। सब स्थानों पर देवताओं की दुंदुभी बजने लगी।
सीता हरषित हृदय मोद न माइ।
मंगल गान करहिं सब नारी।
जनकपुरी आनंद भवानी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सीता जी का हृदय हर्षित हो गया — आनन्द समाता नहीं। सब नारियाँ मंगल-गान करने लगीं — जनकपुरी में आनन्द छा गया।
सीता राम बरे परस्पर जयमाल।
देखत सब मुनि सिद्ध मुदित सचराचर॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सीता और राम ने परस्पर जयमाला पहनाई — सब मुनि, सिद्ध और चराचर जगत देखकर प्रसन्न हुए।
दोहा— जय जय जय धनु भंजन प्रभु सिय राम सुखदाइ।
बरनि न जाइ अनन्द महँ सकल लोक हरषाइ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
धनुष-भंजन प्रभु सीता-राम की जय हो, जय हो, जय हो! जो सबको सुख देने वाले हैं। आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता — सम्पूर्ण लोक हर्षित हो रहा है।

11. परशुराम संवाद

धनुष-भंग के पश्चात् परशुराम और लक्ष्मण के मध्य तीव्र संवाद — श्रीराम की दिव्यता को पहचानकर परशुराम का क्रोध शान्त होना

भृगुपति क्रोध बढ़ा अति भारी।
जानत सिवधनु भंजनहारी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
भृगुपति (परशुराम) जी का क्रोध अत्यन्त भारी बढ़ गया — जानते हैं कि किसी ने शिव-धनुष भंग कर दिया।
कोउ तोरेसि शिव चाप कुठारू।
आवत भयउ क्रोध अगनि प्रचारू॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
किसने शिव जी का धनुष तोड़ा, मेरा फरसा! — ऐसा कहते हुए क्रोध की अग्नि का प्रचार करते परशुराम आये।
लखन सुनि परसुधार बात।
कहत धीर उत्तर बिलोकत गात॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
लक्ष्मण जी ने परशु (फरसा) धारी की बात सुनी — धीरतापूर्वक उनके शरीर को देखते हुए उत्तर कहते हैं।
बहु धनुही तोरीं लरिकाईं।
कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
१ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
लड़कपन में बहुत धनुषियाँ तोड़ीं — कभी ऐसा क्रोध नहीं किया गया, हे गोसाईं!
एहिं धनु पर ममता केहिं हेतू।
सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
२ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
इस धनुष पर ममता किस हेतु? — यह सुनकर भृगुकुलकेतु परशुराम और भी क्रोधित हुए।
रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम त्रिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥
३ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
अरे राजकुमार! काल के वश होकर बोल रहा है, तुझे संभाल नहीं। धनुषी के समान त्रिपुरारि (शिव) का धनुष — यह सम्पूर्ण संसार में प्रसिद्ध है!
लखन कहा हसि हमरे जाना।
सुनहु देव सब धनुष समाना॥
४ ॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
लक्ष्मण ने हँसकर कहा — हमारे जानने में, हे देव! सब धनुष समान हैं।
जौं तुम्ह औतहु तात बिचारी।
नहिं त बात फुर जाइ तुम्हारी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
यदि तुम सोच-विचारकर आये हो, हे तात — नहीं तो तुम्हारी बात व्यर्थ जायेगी।
कहत लखनु बहुबिधि बिहँसत।
परसुराम मन क्रोध बढ़त॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
लक्ष्मण जी अनेक प्रकार से कहते और हँसते हैं — परशुराम जी के मन में क्रोध बढ़ता जाता है।
विश्वामित्र समुझि सब कीन्हा।
परसुराम मन शांतिहि लीन्हा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
विश्वामित्र ने सब समझाया — परशुराम जी ने मन में शान्ति धारण की।
रामहि चितइ बहुत सुख माना।
भृगुबर हृदय गये भगवाना॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
राम को देखकर बहुत सुख माना — भृगुवरश्रेष्ठ (परशुराम) के हृदय में भगवान बस गये।
राम प्रभाउ बिलोकि बड़ भृगुपति भए सुखारि।
बंदि चरन अनुराग अति गए तपोबन बारि॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
श्रीराम का बड़ा प्रभाव देखकर भृगुपति (परशुराम) सुखी हो गये — अत्यन्त अनुराग से चरणों की वन्दना करके तपोवन को चले गये।
दोहा— परसुराम पद बंदि सब आशीष पाई भाल।
राम चरन सिर नाइ पुनि चले सकल सुख साल॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सबने परशुराम जी के चरणों की वन्दना की और मस्तक पर आशीर्वाद पाया। फिर श्रीराम के चरणों में सिर नवाकर सब सुख-सम्पन्न होकर चले।
भृगुपति गए बने तप साधन।
राम विजय जानि जग बंधन॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
भृगुपति तपस्या करने चले गये — राम की विजय जानकर जगत के बन्धन कट गये।
एहि बिधि भयउ परसुराम बिदा।
सकल लोग हरषे मुदित सदा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
इस प्रकार परशुराम जी की विदाई हुई — सब लोग सदा हर्षित और प्रसन्न हुए।

12. विवाह एवं विदाई

सीता-राम एवं चारों भाइयों का पावन विवाह, राजा जनक की भावपूर्ण विदाई एवं अवधपुरी में आनन्दमय वापसी — बालकाण्ड का मंगल उपसंहार

सिय रघुबीर बिबाहु भो सुनि सब लोक बधाइ।
गावत गीत मनोहर बाजत बाजन साई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सीता और रघुवीर का विवाह हुआ — सुनकर सब लोक बधाई देने लगे। मनोहर गीत गाये जाते हैं और बाजे बज रहे हैं।
बरातन्हि बनिकि सोहत बेसा।
दुलहा दुलहिन सुभग सुदेसा॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
बारातियों के बने-ठने वेश शोभित हो रहे हैं — दूल्हा-दुल्हन सुन्दर और शुभ प्रदेश में सुशोभित हैं।
चारिउ सिला जोरि बर पाए।
भरत शत्रुघ्न लखन सुख छाए॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
चारों जोड़ियाँ बनीं — भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण सब सुख से छा गये।
बिबाह भो चारि जोर सुहाई।
बेद बिधि लगन सोई सदा भाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
चारों सुन्दर जोड़ों का विवाह हुआ — वेद-विधि से लग्न सदा के लिए शोभनीय हुई।
हरषे दसरथ सुनत बधाई।
सब स्वजनन्हि लोग सुखदाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
दशरथ जी बधाई सुनकर हर्षित हुए — सब स्वजन और लोग सुखदायी हो गये।
बिबिध खेल कीन्हें सब भाई।
बहुबिधि बिदा कीन्ह जनक राई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सब भाइयों ने विविध खेल किये — राजा जनक ने अनेक प्रकार से विदा किया।
सीता माता पिता पद बंदि।
चलीं सीय बिदा भयउ आनंदी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सीता जी ने माता-पिता के चरण वन्दन किये — सीता जी की विदा हुई, सब आनन्दित हुए।
बिदा कीन्ह सब जनक बोलाई।
बहुत भाँति सीतहि समुझाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
जनक ने सबको बुलाकर विदा किया — सीता जी को बहुत प्रकार से समझाया।
दोहा— कहहिं न जाइ बिदा बेदना जनक राज उर लागी।
बहु बिधि सिख करि जानकिहि सिय हित नगर बिरागी॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
विदा की वेदना कही नहीं जाती जो राजा जनक के हृदय में लगी — अनेक प्रकार से जानकी को शिक्षा देकर सीता-हित में नगर वैरागी हो गया।
चले राम सब संग सुहाए।
अवधपुरी आनंद बढ़ाए॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
श्रीराम सब साथियों सहित सुशोभित होकर चले — अवधपुरी में आनन्द बढ़ गया।
अवधपुरी प्रवेश कीन्ह बरात।
नगर नारि नर आरती कीन्ह प्रभात॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
अवधपुरी में बारात ने प्रवेश किया — नगर के नर-नारियों ने प्रातःकाल आरती की।
सिय सुंदरी प्रभु सुंदर बरु।
सब जग जानि प्रगट सुखकरु॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
सीता सुन्दरी और प्रभु सुन्दर वर — सब जगत जानता है, प्रगट रूप से सुखकारी है।
कीन्ह भाँति बहु समय बिताई।
बसे अवध सुख सम्पति छाई॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
अनेक प्रकार के उत्सव करते हुए समय बिताया — अवध में सुख और सम्पत्ति छा गयी।
दोहा— एहि सुख संपदा सदन बसत बीत कछु काल।
कोमल कथा रामकी सबहि सुहावनि लाल॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
इस सुख-सम्पत्ति में सदन (भवन) में रहते हुए कुछ काल बीता — राम जी की कोमल कथा सबको सुहावनी और सुन्दर (प्रिय) है।
बालकाण्ड कर कीन्ह बिचारू।
गावत सीताराम सुख सारू॥
एहि बिधि बालकाण्ड संपूरन।
मंगल करन अमंगल दूरन॥
हिंदी अर्थ दिखाएँ
बालकाण्ड का विचार किया — सीताराम के सुख-सार का गान किया। इस प्रकार बालकाण्ड सम्पूर्ण हुआ — जो मंगल करने वाला और अमंगल दूर करने वाला है।
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