Kand 2
अयोध्याकाण्ड
Ayodhya Kand
अयोध्याकाण्ड श्रीराम के वनगमन, दशरथ-वियोग, भरत के त्याग और राजधर्म की महान स्थापना का काण्ड है।
मुख्य विषय: राजतिलक से वनवास, भरत-राम मिलन और त्याग की चरम मर्यादा
पद 1अयोध्याकाण्ड नीति
रघुकुल रीति सदा चली आई।
प्राण जाय पर बचन न जाई॥
हिंदी अर्थ
रघुकुल की परंपरा है कि प्राण भले चले जाएँ, पर वचन नहीं तोड़ा जाता।
पद 2अयोध्याकाण्ड राम वचन
पितु बचन मानि चलेउ रघुराई।
सुनि सकल नगर भए दुखदाई॥
हिंदी अर्थ
राम पिता की आज्ञा मानकर वन को चले; यह सुनकर समस्त अयोध्या शोक से भर गई।
पद 3अयोध्याकाण्ड भरत चरित्र
भरतहि होइ न राजमदु विधि हरि हर पद पाइ।
कबहुँकि काँजी सीकरनि क्षीर सिंधु बिनसाइ॥
हिंदी अर्थ
भरत को राज्य का अहंकार नहीं हो सकता; जैसे खटाई की कुछ बूंदें क्षीरसागर को नष्ट नहीं कर सकतीं।
पद 4अयोध्याकाण्ड राम-भरत मिलन
सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु, जस अपजस बिधि हाथ॥
हिंदी अर्थ
मुनि ने कहा कि भाग्य प्रबल है; हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश सब विधाता के हाथ में है।
पद 5अयोध्याकाण्ड भक्ति
सेवक धर्म कठिन जग माहीं।
स्वामि धरम समुझहिं न काहू॥
हिंदी अर्थ
सेवक का धर्म संसार में कठिन है; सच्चे सेवक और स्वामी धर्म का पालन बहुत कम लोग समझते हैं।
पद 6अयोध्याकाण्ड सार
सुनि प्रभु बचन भरत अति रोए।
प्रेम मगन मन बचन न होए॥
हिंदी अर्थ
प्रभु के वचन सुनकर भरत अत्यंत रो पड़े; प्रेम में डूब जाने से वे कुछ कह न सके।
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