प्यासा कौआ
The Thirsty Crow
एक प्यासा कौआ कंकड़ डालकर घड़े का पानी ऊपर उठाता है और अपनी प्यास बुझाता है।
गर्मी के दिन थे। सूरज आग बरसा रहा था। ज़मीन तप रही थी, पेड़ों के पत्ते मुरझा गए थे और नदी-तालाब सूख गए थे। ऐसे भीषण गर्मी में एक कौआ पानी की तलाश में इधर-उधर उड़ रहा था।
कौआ बहुत थका हुआ था। उसका गला सूख रहा था, पंख भारी हो गए थे। उसने एक खेत में देखा — सूखा। एक तालाब देखा — खाली। कौआ निराश होने लगा।
तभी उसकी नज़र एक पुराने घड़े पर पड़ी जो एक पेड़ के नीचे रखा था। कौआ खुशी से उड़कर घड़े के पास गया और अंदर झाँका। पानी था! पर बहुत कम — बिल्कुल तले में। कौए ने अपनी चोंच अंदर डाली, पर चोंच पानी तक पहुँची ही नहीं। घड़ा गहरा था और पानी बहुत नीचे।
कौए ने घड़े को उलटाने की कोशिश की — घड़ा बहुत भारी था। कौए ने सोचा, "क्या करूँ? पानी सामने है पर पी नहीं सकता।"
पर कौआ होशियार था। उसने हार नहीं मानी। उसने चारों तरफ़ देखा और सोचा। तभी उसे एक तरकीब सूझी! पास में ज़मीन पर छोटे-छोटे कंकड़ पड़े थे।
कौए ने एक कंकड़ उठाया और घड़े में डाला — "छपाक!" फिर दूसरा कंकड़ — "छपाक!" फिर तीसरा, चौथा, पाँचवाँ। एक-एक करके कंकड़ डालता गया। हर कंकड़ के साथ पानी थोड़ा-थोड़ा ऊपर आ रहा था।
कौआ थक रहा था, पर रुका नहीं। दस कंकड़, बीस कंकड़, तीस कंकड़... धीरे-धीरे पानी ऊपर आता गया।
आख़िरकार पानी घड़े के मुँह तक आ गया! कौए ने अपनी चोंच डाली और छककर ठंडा पानी पिया। "आह! कितना अच्छा लगा!" कौआ तृप्त हो गया।
पानी पीकर कौआ पेड़ की डाल पर बैठा और ज़ोर से "काँव-काँव" किया — जैसे पूरी दुनिया को बता रहा हो, "मैंने हार नहीं मानी और मुझे रास्ता मिल गया!"
सच तो यह है कि दिमाग़ छोटा-बड़ा नहीं होता — बस उसे सही वक़्त पर इस्तेमाल करना आना चाहिए।
🌟 कहानी की सीख
हार न मानने वालों को हमेशा रास्ता मिल जाता है।
Where there is a will and a clever mind, there is always a way.
