गिलहरी की भक्ति
The Little Squirrel Who Helped Build the Bridge
एक छोटी सी गिलहरी रामसेतु बनाने में मदद करती है और श्रीराम उसकी पीठ पर तीन रेखाएँ बना देते हैं।
श्रीराम की वानर सेना समुद्र पर पुल बना रही थी ताकि लंका पहुँचकर सीता माता को छुड़ाया जा सके। नल और नील के नेतृत्व में लाखों वानर बड़े-बड़े पत्थर और चट्टानें उठा-उठाकर समुद्र में डाल रहे थे। "जय श्रीराम" के नारों से पूरा समुद्र तट गूँज रहा था।
उसी समुद्र किनारे एक छोटी सी गिलहरी रहती थी। वह भूरे रंग की, मुट्ठी जितनी छोटी थी। उसने देखा कि वानर सेना कितनी मेहनत से पुल बना रही है और उसके मन में भी श्रीराम के काम में मदद करने की इच्छा जागी।
गिलहरी ने सोचा, "मैं बड़े पत्थर तो नहीं उठा सकती, पर कुछ तो कर सकती हूँ!" वह समुद्र किनारे गीली रेत पर लोटती और उसके छोटे शरीर पर रेत चिपक जाती। फिर वह दौड़कर पुल तक जाती और रेत को झाड़कर पत्थरों की दरारों में भर देती। फिर वापस दौड़ती, फिर लोटती, फिर रेत ले जाती — बार-बार, बिना रुके।
कुछ बड़े वानरों ने गिलहरी को देखा और हँसने लगे। एक वानर बोला, "अरे छोटी, तू क्या करेगी? तेरी यह मुट्ठी भर रेत से क्या पुल बनेगा? रास्ते से हट!" गिलहरी उदास हो गई, पर उसने काम नहीं छोड़ा।
तभी श्रीराम की नज़र गिलहरी पर पड़ी। उन्होंने देखा कि यह नन्ही सी जीव बिना थके मेहनत कर रही है। राम जी ने गिलहरी को प्यार से अपनी हथेली पर उठाया।
श्रीराम ने कहा, "इस गिलहरी का काम किसी से कम नहीं है। तुम बड़े पत्थर ला रहे हो, पर उन पत्थरों के बीच जो खाली जगह है, वह इस गिलहरी की रेत से भर रही है। भक्ति और मेहनत में छोटा-बड़ा कोई नहीं होता।"
फिर श्रीराम ने अपनी तीन उँगलियाँ गिलहरी की पीठ पर फेरीं। उनकी उँगलियों के निशान गिलहरी की पीठ पर तीन सुंदर धारियाँ बन गईं।
कहते हैं कि तभी से हर गिलहरी की पीठ पर तीन धारियाँ होती हैं — यह श्रीराम के प्रेम और आशीर्वाद की निशानी है।
🌟 कहानी की सीख
कोई भी काम छोटा नहीं होता — सच्ची लगन से किया गया हर प्रयास महत्वपूर्ण है।
No act of devotion is too small. Every effort made with love truly matters.
