गणेश जी की चतुराई
Ganesha Wins the Race
गणेश और कार्तिकेय में संसार का चक्कर लगाने की होड़ होती है और गणेश अपनी बुद्धि से जीत जाते हैं।
कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती के दो पुत्र थे — गणेश और कार्तिकेय। दोनों भाई एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे, पर कभी-कभी उनमें भी छोटी-मोटी नोकझोंक होती रहती थी।
एक दिन नारद मुनि कैलाश पर आए और एक अलौकिक फल लाए — ज्ञान का दिव्य फल। शिव और पार्वती दोनों पुत्रों को फल देना चाहते थे, पर फल एक ही था। दोनों भाई बोले, "मुझे चाहिए!"
शिव जी ने कहा, "इसका एक उपाय है — जो पहले पूरे संसार का चक्कर लगाकर वापस यहाँ आएगा, फल उसी का।"
कार्तिकेय तो तुरंत तैयार हो गए। वे अपने मोर वाहन पर बैठे और तेज़ी से उड़ चले। बिजली की गति से संसार का चक्कर लगाने निकल पड़े।
गणेश जी वहीं खड़े रहे। उनका वाहन था मूषक — छोटा सा चूहा। इतने बड़े संसार का चक्कर एक चूहे पर? सब सोचने लगे कि गणेश हार गए।
पर गणेश जी मुस्कुराए। उन्होंने शांति से अपने माता-पिता से कहा, "कृपया यहाँ बैठिए।" फिर गणेश जी ने हाथ जोड़कर अपने माता-पिता की सात परिक्रमा की।
शिव जी ने पूछा, "पुत्र, यह क्या कर रहे हो?"
गणेश जी ने प्रणाम करके कहा, "पिताजी, शास्त्रों में लिखा है कि माता-पिता की परिक्रमा करना पूरे संसार की परिक्रमा करने के बराबर है। मेरे लिए आप दोनों ही मेरा पूरा संसार हैं।"
शिव और पार्वती का हृदय भर आया। शिव जी ने प्रसन्न होकर दिव्य फल गणेश जी को दे दिया।
जब कार्तिकेय थके-हारे वापस लौटे और सब जाना, तो उन्होंने भी गणेश भैया की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की।
इसीलिए गणेश जी को बुद्धि के देवता कहा जाता है। हर शुभ कार्य से पहले सबसे पहले गणेश जी की पूजा होती है।
🌟 कहानी की सीख
बुद्धि शारीरिक बल से अधिक शक्तिशाली होती है।
Intelligence and love are greater than speed and strength.
