गणेश जी का जन्म
The Birth of Lord Ganesha
माता पार्वती चंदन से गणेश की रचना करती हैं और भगवान शिव उन्हें हाथी का सिर देते हैं।
कैलाश पर्वत पर माता पार्वती रहती थीं। एक दिन उन्हें स्नान करना था, पर घर पर कोई पहरेदार नहीं था। पार्वती जी ने सोचा, "मुझे अपना एक ऐसा सेवक चाहिए जो केवल मेरी आज्ञा माने।"
पार्वती जी ने चंदन का लेप लिया, उबटन मिलाया और अपने हाथों से एक सुंदर बालक की मूर्ति बनाई। फिर अपनी दिव्य शक्ति से उसमें प्राण डाल दिए। वह बालक जागा — गोल-मटोल, प्यारा सा। पार्वती जी ने उसे गले लगाया और कहा, "तू मेरा पुत्र है।" फिर उन्होंने उसे एक डंडा दिया और कहा, "द्वार पर खड़ा रह, किसी को भी अंदर मत आने देना।"
बालक द्वार पर खड़ा हो गया — माता की आज्ञा पालन करने के लिए दृढ़ संकल्प।
तभी भगवान शिव आए। उन्होंने अंदर जाना चाहा, पर इस अनजान बालक ने रोक दिया। "आप कोई भी हों, माता ने मना किया है!" शिव जी ने कहा, "मैं इस घर का स्वामी हूँ!" पर बालक नहीं हिला। शिव जी के गणों ने बालक से युद्ध किया, पर वह अकेला सबको हरा रहा था।
अंत में क्रोध में शिव जी ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया। जब पार्वती जी बाहर आईं और अपने पुत्र को इस हाल में देखा, तो उनके क्रोध से तीनों लोक काँपने लगे।
शिव जी को सब बात समझ आई। उन्होंने तुरंत अपने गणों से कहा, "जाओ, उत्तर दिशा में सबसे पहले जो प्राणी मिले, उसका सिर लेकर आओ।"
गण गए और सबसे पहले एक हाथी का बच्चा मिला। उसका सिर लाया गया। शिव जी ने उस हाथी के सिर को बालक के धड़ पर रखा और अपनी शक्ति से उसे जीवित कर दिया।
बालक उठकर बैठ गया — हाथी के सिर वाला, बड़े कानों वाला, लंबी सूँड वाला, पर उतना ही प्यारा। पार्वती जी ने खुशी से गले लगाया। शिव जी ने कहा, "आज से यह मेरे सभी गणों का अधिपति होगा — इसका नाम होगा गणेश!" तभी से गणेश जी सबसे पहले पूजे जाते हैं।
🌟 कहानी की सीख
हर समस्या का समाधान होता है — धैर्य और प्रेम से सब ठीक हो जाता है।
Every ending is a new beginning, and obedience comes from love.
