मार्कण्डेय पुराण — देवी महात्म्यम्
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता
Ya Devi sarva-bhuteshu shakti-rupena samsthita
"जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में विराजमान हैं, उन्हें बारम्बार नमन।"
— Madhyama Charita 5.9, Devi Mahatmyam
700
श्लोक (सप्तशती)
13
अध्याय
3
चरित्र
Markandeya
पुराण
शाक्त परम्परा का सर्वोच्च ग्रन्थ — जिसके 700 श्लोक प्रत्येक एक जीवन्त मंत्र हैं। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती — तीन रूपों में एक महाशक्ति।
देवी महात्म्यम् (दुर्गा सप्तशती) मार्कण्डेय पुराण के 81-93 अध्यायों में संकलित एक स्वतंत्र रचना है। 700 श्लोकों में तीन चरित्रों के माध्यम से महाशक्ति (देवी / दुर्गा) की विजय-गाथा वर्णित है। यह ग्रन्थ शाक्त परम्परा का मूलाधार है और नवरात्र पाठ का केन्द्रीय विधान — प्रत्येक श्लोक एक जीवन्त मंत्र है।
स्रोत
मार्कण्डेय पुराण (अ. 81–93)
चरित्र
3 (प्रथम, मध्यम, उत्तम)
मुख्य देवी
महादेवी / दुर्गा / चण्डी
पाठ-विधि
नवरात्र में 9 पारायण
प्रथम से उत्तम — देवी महात्म्यम् की त्रि-विध गाथा
देवी महात्म्यम् की वे गाथाएँ जो नवरात्र और दुर्गा-पूजा को अर्थ देती हैं
महिषासुर से पराजित देवताओं के तेज से देवी का प्रकट होना। शिव का तेज = मुख, यम = केश, विष्णु = भुजाएँ, चन्द्र = स्तन, इन्द्र = कटि, वरुण = जंघाएँ। शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, वरुण का पाश, इन्द्र का वज्र, ब्रह्मा का कमण्डल। हिमालय ने सिंह दिया। देवी सभी दिव्य शक्तियों का समग्र।
महिषासुर का विवाह-प्रस्ताव। देवी: "जो युद्ध में जीते, वही मेरा पति।" नौ दिन — नवरात्र का उद्गम। भैंस, सिंह, मनुष्य, हाथी — हर रूप पराजित। दसवें दिन (विजया-दशमी) — पैर से गर्दन दबाकर त्रिशूल से वध। देवताओं ने पुष्प-वर्षा की।
रक्तबीज का वरदान: रक्त की हर बूँद से नया रक्तबीज। घाव जितने अधिक, शत्रु उतना बड़ा। चण्डिका का आह्वान। काली का प्रकट होना — जिह्वा बाहर, मुण्डमाला, पात्र। काली ने जिह्वा से सारा रक्त पान किया — एक भी बूँद धरती पर नहीं पड़ी। रक्तबीज निस्तेज हुआ। काली की जीभ बाहर निकली छवि यहीं से।
चण्ड-मुण्ड से युद्ध में अम्बिका का क्रोध — ललाट से काली का प्रकट होना। श्यामवर्ण, खुले केश, लाल नेत्र, बाहर जिह्वा, मुण्डमाला, खड्ग। तीनों लोकों को हिलाने वाली अट्टहास। चण्ड-मुण्ड का वध — चामुण्डेश्वरी नाम। देवी के शरीर से सप्त-मातृका (ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, इन्द्राणी, कौमारी, वाराही, नारसिंही) का प्रकट होना।
शुम्भ-वध के बाद नारायणी-स्तुति। राजा सुरथ और वैश्य समाधि को वरदान। देवी का संकल्प: "जब-जब धर्म संकट में होगा, मैं प्रकट होऊँगी।" भावी अवतार: शाकम्भरी (अकाल में), भ्रामरी (कीटों के संकट में)। नवरात्र में पाठ का फल — सर्व-संकट-नाश। देवी महात्म्यम् का फलश्रुति।
नवरात्र = महिषासुर-मर्दिनी के 9 दिनों के युद्ध से जन्मे। नव-दुर्गा: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। चैत्र और शारदीय नवरात्र। दशमी = विजया-दशमी = महिषासुर-वध का दिन। नवरात्र में देवी महात्म्यम् पाठ — मुख्य विधान।
सप्तशती = 700 श्लोक — प्रत्येक एक जीवन्त मंत्र। शाक्त परम्परा में पाठ-प्रधान ग्रन्थ। सम्पूर्ण विधान: कवच, अर्गला, कीलक, रात्रि-सूक्त, देवी-सूक्त। नवार्ण मंत्र: "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।" नवरात्र में 9 पारायण। संकट में, मंगल-कार्य में, नित्य-पाठ में — शाक्त-साधकों का मूल ग्रन्थ।
महिषासुर-मर्दन के नौ-दिवसीय युद्ध से जन्मा — नवरात्र
शैलपुत्री
पहली रात
ब्रह्मचारिणी
दूसरी रात
चन्द्रघण्टा
तीसरी रात
कूष्माण्डा
चौथी रात
स्कन्दमाता
पाँचवीं रात
कात्यायनी
छठी रात
कालरात्रि
सातवीं रात
महागौरी
आठवीं रात
सिद्धिदात्री
नौवीं रात
देवी महात्म्यम् के चार दार्शनिक स्तम्भ
सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक — बारम्बार विभिन्न रूपों के साथ: "जो देवी सब प्राणियों में शक्ति, चेतना, निद्रा, क्षुधा, छाया, बुद्धि, क्षमा, श्री, स्मृति, दया, तुष्टि के रूप में स्थित है — उन्हें नमन।" देवी केवल मन्दिर में नहीं — हर प्राणी की ऊर्जा, चेतना और जीवन-शक्ति में।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
Ya Devi sarva-bhuteshu shakti-rupena samsthita / Namastasyai namastasyai namastasyai namo namah
— Madhyama Charita 5.9-82, Devi Mahatmyam
देवी महात्म्यम् का केन्द्रीय दर्शन: सरस्वती (सत्त्व), लक्ष्मी (रज), काली/दुर्गा (तम) — तीनों एक ही महादेवी के रूप हैं। प्रथम चरित्र = महाकाली (तम), मध्यम चरित्र = महालक्ष्मी (रज), उत्तम चरित्र = महासरस्वती (सत्त्व)।
त्वं विष्णुमाया विश्वेश्वरी त्वं ब्रह्म-स्वरूपिणी। सरस्वती त्वं च लक्ष्मी त्वं च शक्ति-स्वरूपिणी।।
Tvam Vishnu-maya vishveshvari tvam Brahma-svarupini / Saraswati tvam cha Lakshmi tvam cha Shakti-svarupini
— Prathama Charita 1.78-79, Devi Mahatmyam
नौ अक्षर: ॐ (ब्रह्म), ऐं (सरस्वती-बीज), ह्रीं (माया-बीज / महालक्ष्मी), क्लीं (काम-बीज / महाकाली), चामुण्डायै (चाण्ड-मुण्ड-हन्त्री), विच्चे (काटो / नष्ट करो)। सप्तशती-पाठ से पूर्व, मध्य और अन्त में। शाक्त परम्परा में गायत्री-मंत्र के समकक्ष।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
Om Aim Hreem Kleem Chamundayai Viche
— Kavacha & Navarna Vidhi, Devi Mahatmyam
भगवद्गीता के "यदा यदा हि धर्मस्य" के समकक्ष — देवी का वरदान: "जब-जब दैत्य-पीड़ा होगी, मैं अवतरित होकर शत्रुओं का नाश करूँगी।" शाकम्भरी, भ्रामरी, रक्तदन्तिका। फलश्रुति: श्रद्धापूर्वक श्रवण से दारिद्र्य, भय, रोग और संकट का नाश।
एवं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति। तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्।।
Yada yada hi dharmasya glanir bhavati bharata... tatratma-vishvarupam sthapayamy aham
— Uttama Charita 11.49-55, Devi Mahatmyam
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