संकट मोचन हनुमानाष्टक — संपूर्ण पाठ एवं अर्थ

संकट मोचन हनुमानाष्टक — गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित — हनुमान जी के 8 महान कार्यों का वर्णन करते हुए उनसे संकट निवारण की प्रार्थना है। यह केवल पाठ नहीं, बल्कि हनुमान जी की शक्ति का स्मरण है जो भक्त के भीतर साहस और विश्वास जगाता है।

🕐 सर्वोत्तम समय: मंगलवार सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्म मुहूर्त), या शनिवार सायंकाल। मंगलवार को पाठ का फल 3 गुना अधिक।

8 छंद — पाठ और अर्थ

छंद 1

बाल समय रवि भक्षि लियो तब तीनहुं लोक भयो अंधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो। देवन आनि करी बिनती तब छाड़ि दियो रवि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।

अर्थ बालक हनुमान ने सूर्य को फल समझकर निगल लिया — जिससे तीनों लोक अंधेरे में डूब गए। देवताओं की प्रार्थना पर सूर्य को मुक्त किया। संदेश: सबसे बड़े संकट को भी हनुमान हल कर सकते हैं।
छंद 2

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो। चौंकि महामुनि साप दियो तब चाहिए कौन बिचार बिचारो। कैद्वित देखि कहूं किरात अचानक मोह लियो गिरि भारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।

अर्थ बाली के अत्याचार से पीड़ित सुग्रीव को आश्रय दिया। ऋषि के शाप से जो भूला, उसे याद दिलाया। यह छंद बताता है कि हनुमान स्मृति-भ्रंश और मानसिक संकट में भी सहायक हैं।
छंद 3

अंगद के संग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो। जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाये इहां पगु धारो। हेरि थके तट सिंधु सबे तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।

अर्थ जब सभी वानर निराश होकर समुद्र के किनारे बैठ गए, तब हनुमान ने समुद्र पार कर सीता माता की खोज की और सबके प्राण बचाए। संदेश: असंभव कार्य भी हनुमान कृपा से सिद्ध होते हैं।
छंद 4

बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो। लेहु महाबैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोण सुधा करि ढारो। आनि सजीवन हाथ दियो तब लछिमन के तुम प्रान उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।

अर्थ लक्ष्मण को रावण-पुत्र की शक्ति लगने पर हनुमान ने वैद्य सुषेन को लाकर, द्रोण पर्वत उखाड़कर संजीवनी बूटी से लक्ष्मण को जिलाया। यह छंद असाध्य रोग में हनुमान की कृपा का प्रतीक है।
छंद 5

रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग की फांस सबे सिर डारो। श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो। आनि खगेस तबै हनुमान जु बंध सबे काटि डारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।

अर्थ रावण की नाग-पाश से पूरी सेना, यहाँ तक कि राम-लक्ष्मण भी बंधे। हनुमान ने गरुड़ को बुलाकर सबको मुक्त कराया। संदेश: सबसे जटिल बंधनों से भी हनुमान मुक्ति दिला सकते हैं।
छंद 6

बंधु समेत जबे अहिरावण लै रघुनाथ पताल सिधारो। देबिन्हि पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबे मिलि मंत्र बिचारो। जाय सहाय भयो तब ही अहिरावण सैन्य समेत संहारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।

अर्थ अहिरावण राम-लक्ष्मण को पाताल ले गया। हनुमान पाताल पहुँचे, पंचमुखी रूप धारण किया और अहिरावण का वध करके दोनों को बचाया। यह मृत्यु-भय और अदृश्य शत्रु से रक्षा का प्रतीक है।
छंद 7

काज किये बड़ देवन के तुम वीर महाप्रभु देखि बिचारो। कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो। बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।

अर्थ यह छंद एक व्यक्तिगत प्रार्थना है — भक्त कहता है: जब देवताओं के कार्य तुमने किए, तो मेरे जैसे छोटे की पीड़ा क्या है? हे संकट मोचन, मेरी मदद करो।
छंद 8

लाल देह लाली लसे अरु धूलि धूसरित अंग। वज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि संग।।

अर्थ यह अंतिम दोहा हनुमान के लाल-आभायुक्त, धूल-धूसरित, वज्र शरीर का वर्णन करता है — यही उनका असली रूप है जो भक्तों को संकट से मुक्त करता है।

📅 पाठ से अपेक्षित परिणाम

दिनअपेक्षित परिणाम
3प्रारंभिक शांति — भय और चिंता कम होती है।
7अवरोध टूटने लगते हैं। परिस्थितियाँ बदलना शुरू।
21गहरी बाधाएँ दूर होती हैं। शत्रु-पीड़ा कम।
40संकट का पूर्ण निवारण। नकारात्मक ऊर्जा का शमन।

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