भगवान शिव की आरती
शिव देव को समर्पित पवित्र प्रार्थना, ध्यान और योग के देव, हिंदू त्रिदेव में विनाशक के रूप में पूजित।
प्रातःकालीन प्रार्थना और ध्यान के समय सामान्यतः पाठ किया जाता है; शिव मंदिरों की सायंकालीन आरती में भी
हिंदू दर्शन में शिव परम चेतना हैं। यह आरती उनके ब्रह्मांडीय नृत्य (नटराज) और परम योगी के रूप में उनकी भूमिका का गुणगान करती है।
महत्व एवं विशेषता
शिव आरती, जिसे 'ॐ जय शिव ओंकारा' के नाम से जाना जाता है, हिंदू धर्म की शैव परंपरा में सबसे पूजनीय भजनों में से एक है। भगवान शिव, हिंदू त्रिमूर्ति के तीसरे देवता, विलय और परिवर्तन के ब्रह्मांडीय सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते हैं। नकारात्मक अर्थ में विनाश के विपरीत, शिव की भूमिका उस आवश्यक विलय का प्रतिनिधित्व करती है जो नवीनीकरण और पुनर्जनन से पहले आता है।
यह आरती पवित्र ध्वनि 'ॐ' से शुरू होती है, जो हिंदू दर्शन में वह आदिम ध्वनि है जिससे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई। फिर भजन शिव के दिव्य गुणों का वर्णन करता है — ब्रह्मा (सृजनकर्ता), विष्णु (संरक्षक) और सदाशिव (शाश्वत चेतना) के रूप में उनका स्वरूप, उन्हें सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्थापित करता है।
इस आरती में वर्णित शिव के अलंकार — भस्म, रुद्राक्ष माला, त्रिशूल (तीन गुणों का प्रतीक) और जटाओं पर अर्धचंद्र — प्रत्येक चेतना, काल और ब्रह्मांडीय संतुलन के गहन दार्शनिक सत्यों का प्रतीक हैं।
यह आरती महाशिवरात्रि उत्सव का केंद्र है, जो प्रतिवर्ष भारत भर में मनाई जाती है। यह शिव मंदिरों में, विशेषकर संध्या आरती के समय प्रतिदिन की जाती है। सोमनाथ से केदारनाथ तक के बारह ज्योतिर्लिंग मंदिरों में लाखों भक्त इस पवित्र स्तुति का गायन करते हुए शिव से आंतरिक शांति, सांसारिक मोह से विरक्ति और परम मोक्ष की प्रार्थना करते हैं।
Hindi Lyrics (मूल पाठ)
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी। त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे। सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी। जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा। भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला। शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥
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