देवी दुर्गा की आरती
महत्व एवं विशेषता
दुर्गा आरती 'जय अम्बे गौरी' हिंदू धर्म में शक्ति पूजा का केंद्रीय भक्ति गीत है और नवरात्रि की नौ रातों के दौरान अत्यंत महत्व रखती है — दिव्य माता को समर्पित सबसे महत्वपूर्ण त्योहार। देवी दुर्गा, जिनका नाम 'अजेय' का अर्थ रखता है, उस आदि स्त्री शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं जो ब्रह्मांड का पालन और रक्षा करती हैं।
देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के अनुसार, जब महिषासुर ने देवताओं को पराजित कर ब्रह्मांड को अंधकार में डुबोने की धमकी दी, तब सभी देवताओं का संयुक्त तेज देवी दुर्गा के रूप में प्रकट हुआ। प्रत्येक देवता के दिव्य अस्त्रों — शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, इंद्र का वज्र — से सुसज्जित, उन्होंने एक ब्रह्मांडीय युद्ध में महिषासुर का वध किया और धर्म तथा ब्रह्मांडीय व्यवस्था की पुनर्स्थापना की।
यह आरती दुर्गा को 'अम्बे गौरी' के रूप में संबोधित करती है — वह माता जो भयंकर रक्षक भी हैं और कोमल पालनहार भी। भजन उनके सिंह पर आगमन का वर्णन करता है, जो साहस और संप्रभुता का प्रतीक है, और महालक्ष्मी (समृद्धि) से महाकाली (बुराई का विनाश) तक उनके विभिन्न स्वरूपों का चित्रण करता है। चार भुजाएं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — मानव जीवन के चार लक्ष्यों — का प्रतिनिधित्व करती हैं।
नवरात्रि के दौरान, भारत भर में लाखों भक्त नौ रातों तक प्रतिदिन दो बार — प्रातः और संध्या को — यह आरती करते हैं। दसवें दिन (विजयादशमी/दशहरा) दुर्गा की अंतिम विजय का उत्सव मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल में यही उत्सव दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है, जो यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त सांस्कृतिक विरासत परंपरा है। यह आरती भक्तों को इस सशक्त सत्य से जोड़ती है कि सर्वोच्च दिव्य शक्ति स्त्री रूपा है — वह माता जो सृजन भी करती हैं और रक्षा भी।
Hindi Lyrics (मूल पाठ)
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥ तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिव जी॥ जय अम्बे गौरी॥ मांग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दो नैना, चन्द्रवदन नीको॥ जय अम्बे गौरी॥ कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै। रक्त पुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥ जय अम्बे गौरी॥ केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी॥ जय अम्बे गौरी॥ कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥ जय अम्बे गौरी॥ शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ जय अम्बे गौरी॥ चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ जय अम्बे गौरी॥ ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे गौरी॥ चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरू। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे गौरी॥ तुम ही जग की माता, तुम ही हो भर्ता। भक्तन की दुख हर्ता, सुख सम्पत्ति कर्ता॥ जय अम्बे गौरी॥ भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी। मनवान्छित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे गौरी॥ कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥ जय अम्बे गौरी॥ श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥ जय अम्बे गौरी॥
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