वैदिक स्तोत्र — शुक्रवार
महालक्ष्मी अष्टकम्
इंद्र द्वारा रचित — खोया हुआ वैभव वापस पाने की प्रार्थना
अक्षय तृतीया के बाद शुक्रवार — विशेष महत्व
अक्षय तृतीया पर अर्जित धन और समृद्धि को "सुरक्षित" करने के लिए महालक्ष्मी अष्टकम् का पाठ करें। किंवदंती है कि जब इंद्र ने अपना राज्य खोया, तब इसी स्तोत्र से माँ लक्ष्मी की कृपा पुनः प्राप्त की।
महालक्ष्मी अष्टकम् — संपूर्ण पाठ
श्लोक १
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोऽस्तुते॥
हे महामाया! श्री-पीठ में देवताओं द्वारा पूजित, शंख-चक्र-गदा धारिणी महालक्ष्मी को नमस्कार।
श्लोक २
नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि। सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तुते॥
हे गरुड़ पर आरूढ़, कोलासुर को भयभीत करने वाली, सभी पापों को हरने वाली देवी महालक्ष्मी को नमस्कार।
श्लोक ३
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि। सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तुते॥
हे सर्वज्ञ, सभी को वरदान देने वाली, दुष्टों को भयभीत करने वाली, सभी दुःखों को हरने वाली देवी महालक्ष्मी को नमस्कार।
श्लोक ४
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि। मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तुते॥
हे सिद्धि-बुद्धि देने वाली, भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली, सदा मंत्रमूर्त देवी महालक्ष्मी को नमस्कार।
श्लोक ५
आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि। योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोऽस्तुते॥
हे आदि-अंत से रहित, आद्यशक्ति महेश्वरी, योग से उत्पन्न देवी महालक्ष्मी को नमस्कार।
श्लोक ६
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे। महापापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तुते॥
हे स्थूल-सूक्ष्म रूप धारिणी, महारौद्री, महाशक्ति, महोदरी, महापापों को हरने वाली देवी महालक्ष्मी को नमस्कार।
श्लोक ७
पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि। परमेशि जगन्माता महालक्ष्मी नमोऽस्तुते॥
हे कमल-आसन पर स्थित, परब्रह्म स्वरूपिणी, परमेश्वरी, जगत-माता देवी महालक्ष्मी को नमस्कार।
श्लोक ८
श्वेताम्बरधरे देवि नानालंकारभूषिते। जगत्स्थिते जगन्माता महालक्ष्मी नमोऽस्तुते॥
हे श्वेत वस्त्र धारिणी, नाना अलंकारों से सुशोभित, जगत में स्थित जगन्माता देवी महालक्ष्मी को नमस्कार।
फलश्रुति
महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः। सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा। एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्। द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः। त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्। महालक्ष्मीर्भवेत्तस्य वरदा शुभदा सदा॥ फलश्रुति: जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस अष्टकम् का पाठ करता है, उसे सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। एक बार पाठ से महापाप नष्ट, दो बार से धन-धान्य और तीन बार से शत्रु-नाश होता है।