🕉️ पतञ्जल योगसूत्र
महर्षि पतञ्जलि रचित | योग दर्शन का मूलग्रन्थ | 196 सूत्र, 4 पाद
योगसूत्र महर्षि पतञ्जलि द्वारा रचित योग दर्शन का मूलाधार ग्रन्थ है। इसमें 4 पाद (अध्याय) और 196 सूत्र हैं जो मन की प्रकृति, आत्मा की मुक्ति का मार्ग और अष्टांग योग की विस्तृत व्याख्या करते हैं। यह ग्रन्थ हठयोग से बहुत भिन्न है — इसका मुख्य विषय राज-योग अर्थात् मानस की साधना है।
चार पाद (अध्याय)
योग की प्रकृति, मन और समाधि के मार्ग पर। योग को चित्त-वृत्ति-निरोध के रूप में परिभाषित करता है।
साधना पर। क्रिया-योग और अष्टांग योग प्रणाली का विस्तृत वर्णन।
दिव्य शक्तियों (सिद्धियों) पर। धारणा, ध्यान, समाधि — अन्तरंग त्रय — और उनसे प्राप्त विभूतियों का वर्णन।
कैवल्य (मुक्ति) पर। पुरुष (आत्मा) का सम्पूर्ण स्वातन्त्र्य — गुणों का प्रकृति में प्रत्यावर्तन।
8 मुख्य योगसूत्र
अष्टांग योग — आठ अंग
योगसूत्र का महत्त्व
- योगसूत्र राज-योग का सर्वोच्च प्रमाण ग्रन्थ है — मन की वृत्तियों को समझने की कुंजी।
- 196 सूत्रों में पूरे मनोविज्ञान की व्याख्या है — आधुनिक मनोचिकित्सा से सहस्रों वर्ष पूर्व।
- अष्टांग योग का वैज्ञानिक मार्ग — आसन केवल तीसरा अंग है; असली यात्रा यम से समाधि तक है।
- कैवल्य — पुरुष का सम्पूर्ण स्वातन्त्र्य — भारतीय दर्शन का सर्वोच्च लक्ष्य।
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