वेदव्यास श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवतम्
12 स्कन्ध — सम्पूर्ण सारांश

निगम-कल्प-तरोर्गलितं फलम्

Nigama-kalpa-taror galitam phalam

"वैदिक-साहित्य रूपी कल्पवृक्ष का पका हुआ फल — शुकदेव के मुख से अमृत से सिंचित।"

— Bhagavatam 1.1.3 (Prathama Skanda)

18,000+

श्लोक

12

स्कन्ध

335

अध्याय

Vyasa

रचयिता

18 महापुराणों में शीर्षस्थ — भक्ति-मार्ग का सर्वोच्च ग्रन्थ। प्रह्लाद, ध्रुव, गजेन्द्र, वामन और कृष्ण की सम्पूर्ण कथा।

श्रीमद्भागवतम् क्या है?

श्रीमद्भागवत महापुराण वेदव्यास द्वारा रचित 18 महापुराणों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। 18,000 से अधिक श्लोकों और 335 अध्यायों में 12 स्कन्धों के माध्यम से यह ग्रन्थ भगवान विष्णु/कृष्ण की महिमा और शुद्ध भक्ति-मार्ग का विवेचन करता है। परीक्षित और शुकदेव के संवाद-रूप में यह पूछे गए प्रश्न का उत्तर देता है: "मरणासन्न व्यक्ति का परम धर्म क्या है?"

वर्गीकरण

महापुराण, परमहंस संहिता

स्कन्ध

12 (प्रथम से द्वादश)

मूल भाषा

Sanskrit (Puranic)

केन्द्रीय देवता

भगवान विष्णु / कृष्ण

बारह स्कन्ध

प्रथम से द्वादश — श्रीमद्भागवत का सम्पूर्ण विस्तार

स्कन्ध 1

प्रथम स्कन्ध

~210 श्लोक · 19 अध्याय

परीक्षित राजा को शाप — 7 दिन में मृत्यु। गंगा-तट पर शुकदेव से भागवत-श्रवण। नारद-व्यास संवाद — शुद्ध भक्ति का ग्रन्थ रचने की प्रेरणा। प्रश्न: मरणासन्न व्यक्ति का परम धर्म क्या है?

स्कन्ध 2

द्वितीय स्कन्ध

~391 श्लोक · 10 अध्याय

मृत्यु के समय विष्णु-ध्यान — परम धर्म। विराट पुरुष — सृष्टि की उत्पत्ति। विष्णु के विभिन्न रूप। चतुः-श्लोकी भागवत — ब्रह्मा को विष्णु का उपदेश। भागवत माहात्म्य।

स्कन्ध 3

तृतीय स्कन्ध

~1,386 श्लोक · 33 अध्याय

विस्तृत सृष्टि-वर्णन। कपिल-देवहूति संवाद — सांख्य-योग और भक्ति-मार्ग। 24 तत्त्व। वराह अवतार। ब्रह्मा का कमल से जन्म।

स्कन्ध 4

चतुर्थ स्कन्ध

~1,441 श्लोक · 31 अध्याय

दक्ष-यज्ञ। ध्रुव की भक्ति — 5 वर्षीय बालक का तप और ध्रुव-तारा बनना। प्रचेताओं की कथा। पुरंजन-आख्यान — शरीर-नगरी में जीव की यात्रा।

स्कन्ध 5

पञ्चम स्कन्ध

~729 श्लोक · 26 अध्याय

ब्रह्माण्डीय भूगोल — सप्त-द्वीप, मेरु, नरक-लोक। ऋषभदेव की वैराग्य-कथा। भरत — जिनके नाम पर भारत है — मृग-मोह और पुनर्जन्म।

स्कन्ध 6

षष्ठ स्कन्ध

~807 श्लोक · 19 अध्याय

अजामिल की कथा — मृत्यु के समय नारायण-नाम से मुक्ति। नारायण-कवच। चित्रकेतु की कथा। वृत्रासुर-वध और इन्द्र का प्रायश्चित्त।

स्कन्ध 7

सप्तम स्कन्ध

~748 श्लोक · 15 अध्याय

प्रह्लाद महाराज — 5 वर्षीय बालक-भक्त। हिरण्यकशिपु के अत्याचार। विष, अग्नि, पर्वत, समुद्र — हर जगह से विष्णु-रक्षा। "तेरा विष्णु कहाँ है?" — स्तम्भ से नरसिंह का प्रकट होना। नरसिंह अवतार।

स्कन्ध 8

अष्टम स्कन्ध

~921 श्लोक · 24 अध्याय

गजेन्द्र-मोक्ष — हाथी की पूर्ण-शरणागति और विष्णु का आगमन। समुद्र-मन्थन — अमृत, लक्ष्मी, धन्वन्तरि, हालाहल। वामन अवतार — महाबलि का वचन, तीन पग।

स्कन्ध 9

नवम स्कन्ध

~838 श्लोक · 24 अध्याय

राजवंश-वर्णन। सूर्य-वंश, चन्द्र-वंश। संक्षिप्त रामायण (राम-कथा)। अम्बरीष और दुर्वासा। यदु-वंश — कृष्ण के पूर्वज।

स्कन्ध 10

दशम स्कन्ध

~3,943 श्लोक · 90 अध्याय

भागवत का हृदय — सर्वाधिक विस्तृत स्कन्ध। कृष्ण-जन्म (कंस-कारागार), यमुना-पार, वृन्दावन का बचपन, माखन-चोरी, कालिया-दमन, गोवर्धन-धारण, रास-लीला, भ्रमर-गीत, कंस-वध, द्वारका-स्थापना। गोपिका-गीत।

स्कन्ध 11

एकादश स्कन्ध

~1,002 श्लोक · 31 अध्याय

उद्धव-गीता — कृष्ण का अन्तिम उपदेश। ज्ञान, भक्ति और योग का समन्वय। अवधूत की 24 गुरुओं से शिक्षा। यदु-वंश का अन्त। कृष्ण का लोक-प्रयाण।

स्कन्ध 12

द्वादश स्कन्ध

~539 श्लोक · 13 अध्याय

परीक्षित का मोक्ष — भागवत-श्रवण के बाद शान्त मृत्यु। कलि-युग के लक्षण। उपाय: "हरेर् नाम एव केवलम्"। भागवत का माहात्म्य — एक श्लोक भी पाप नष्ट करे।

प्रमुख कथाएँ

श्रीमद्भागवत की वे कथाएँ जो सनातन-धर्म को जीवित रखती हैं

ध्रुव — जो तारा बन गया

पाँच वर्षीय ध्रुव को सौतेली माँ ने पिता की गोद से दूर किया। माँ की सलाह — विष्णु की तपस्या करो। मधुवन में एक पैर पर खड़े होकर कठोर तप। विष्णु का प्रकट होना। ध्रुव-तारा — जिसके चारों ओर सभी तारे घूमते हैं।

प्रह्लाद और नरसिंह अवतार

हिरण्यकशिपु के अत्याचार। प्रह्लाद की अटल भक्ति। विष, पर्वत, हाथी, समुद्र, अग्नि — सब विफल। "स्तम्भ में है तेरा विष्णु?" — स्तम्भ से नरसिंह। सन्ध्याकाल, देहरी पर, नाखूनों से, जाँघ पर — प्रत्येक शर्त की पूर्ति।

गजेन्द्र-मोक्ष — हाथी की प्रार्थना

गजेन्द्र — अभिमानी राजा का हाथी के रूप में पुनर्जन्म। एक हजार वर्ष का संघर्ष। थका हुआ हाथी — कमल उठाकर प्रार्थना: "हे आदिदेव!" — पूर्ण शरणागति। विष्णु का वैकुण्ठ से आगमन। गजेन्द्र-मोक्ष। गजेन्द्र-स्तुति — संस्कृत साहित्य में अद्वितीय।

वामन अवतार और महाबलि

महाबलि का त्रिभुवन-विजय। विष्णु — वामन-अवतार। तीन पग की भिक्षा। पहला पग — पृथ्वी, दूसरा — आकाश। तीसरे के लिए महाबलि ने सिर झुकाया। विष्णु ने सुतल-लोक दिया और स्वयं द्वारपाल बने।

कृष्ण-जन्म — कंस के कारागार में

देवकी-वसुदेव का कारावास। कंस द्वारा छह संतानों की हत्या। कृष्ण-जन्म — मध्यरात्रि, द्वार खुले, पहरेदार सोये। वसुदेव — यमुना पार, नन्द-यशोदा के यहाँ। कन्या का स्वयं को योगमाया घोषित करना।

गोवर्धन-पूजा — पर्वत उठाना

वृन्दावन में इन्द्र-पूजा का विरोध। कृष्ण की गोवर्धन-पूजा। इन्द्र का कोप — सात दिन की अखण्ड वर्षा। कृष्ण ने गोवर्धन को कनिष्ठिका-उंगली पर उठाया। सात दिन — सबको छत्र-छाया। इन्द्र का समर्पण और कृष्ण-अभिषेक।

रास-लीला — दिव्य प्रेम का नृत्य

शरद-पूर्णिमा — कृष्ण की बाँसुरी। गोपियों का सब-कुछ छोड़कर आना। अहंकार आते ही कृष्ण का अन्तर्धान। गोपिका-गीत — दिव्य विरह-काव्य। पूर्ण शरणागति के बाद रास-नृत्य। एक-एक गोपी के साथ कृष्ण — माधुर्य-भक्ति का चरम।

भागवत दर्शन — मुख्य शिक्षाएँ

श्रीमद्भागवत के चार दार्शनिक स्तम्भ

नव-विधा भक्ति — भक्ति के 9 रूप

प्रह्लाद द्वारा 7वें स्कन्ध में उपदिष्ट: (1) श्रवण, (2) कीर्तन, (3) स्मरण, (4) पाद-सेवन, (5) अर्चन, (6) वन्दन, (7) दास्य, (8) सख्य, (9) आत्म-निवेदन। इनमें से कोई एक भी सिद्ध हो तो मोक्ष।

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम् / अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यं आत्म-निवेदनम्

Shravanam kirtanam vishnoh smaranam pada-sevanam / Archanam vandanam dasyam sakhyam atma-nivedanam

Saptama Skanda 5.23, Srimad Bhagavatam

निगम-कल्प-तरु — पका हुआ फल

भागवत (1.1.3): "वैदिक-साहित्य रूपी कल्पतरु का पका फल — शुकदेव के मुख से अमृत से सिंचित।" वेद = कल्पतरु; भागवत = उसका परिपक्व फल; शुक (तोते) के मुख से — द्विगुण मधुरता।

निगम-कल्प-तरोर्गलितं फलम् / शुक-मुखाद् अमृत-द्रव-संयुतम्

Nigama-kalpa-taror galitam phalam / Shuka-mukhad amrita-drava-samyutam

Prathama Skanda 1.3, Srimad Bhagavatam

हरेर् नाम — कलि-युग का उपाय

द्वादश स्कन्ध: कलि-युग में एकमात्र उपाय — हरि-नाम। "नास्त्येव, नास्त्येव, नास्त्येव" — तीन बार की दृढ़ घोषणा। तप, यज्ञ, ध्यान कठिन — केवल नाम-कीर्तन।

हरेर् नाम हरेर् नाम हरेर् नामैव केवलम् / कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिर् अन्यथा

Harer nama harer nama harer namaiva kevalam / Kalau nasty eva nasty eva nasty eva gatir anyatha

Dvadasha Skanda, Srimad Bhagavatam

परीक्षित — श्रवण से परम-मृत्यु

परीक्षित — 7 दिन में मृत्यु निश्चित। भागवत-श्रवण का उपयोग। मृत्यु के समय विष्णु-धाम की प्राप्ति। उत्तम मृत्यु = हरि-कथा-श्रवण में मृत्यु। भागवत-श्रवण = सर्व-पाप-नाश।

तन्-नाम-ग्रहण-स्मरण-कीर्तन... सर्व-पाप-प्रशमनम्

Tan-nama-grahana-smarana-keertana... sarva-papa-prashamanam

Dvadasha Skanda 12.6, Srimad Bhagavatam

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